२६ जनवरी २०१० को दैनिकभास्कर ,राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित आलेख- स्वाति तिवारी
भारतीय संस्कृति और संस्कारों में सबसे ऊपर है अपनापन और अपनत्व भाव । जैसे मन अपना, घर अपना, वैसा ही देश अपना प्रदेश अपना । जरूरत है तो बस एक अहसास के साथ अपने प्रदेश को अपना समझने और समझाने की और अगर हम अपनी चीज पर अपना हक खोने लगे तो याद दिलाने में हर्ज ही क्या है ? हक तो याद रहते हैं व्यक्ति को भूलता तो वह दायित्व है- हम सब जानते है जहाँ हक होते हैंै वहीं दायित्व भी होते हैं । ये प्रदेश तो हमारा है ही तो दायित्व भी हमारे ही हैं । इतनी सी बात है यह, अगर हर व्यक्ति की समझ में आ जाए तो मध्यप्रदेश को देश में नम्बर एक प्रदेश बनने में देर नहीं लगेगी - यही बात समझाने की कोशिश है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की ।
भारत का लम्बा इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी समाज ही वहन करता आया है । रियासत काल हो या लोकतांत्रिक सरकारों का समय, समाज हर काम के लिए सरकार पर आश्रित नहीं रहता । विकास गंगा में बूंद-बूंद की तरह आमजन की भागीदारी जरूरी होती है । आज का दौर आपाधापी का दौर है - भागमभाग का, जिसके चलते व्यक्ति में यह धारणा घर करती चली गई है कि मेरा काम अपने लिए सोचना है । प्रदेश के विकास के लिए सरकार सोचेगी । सरकार कौन ? जो सत्ता में है वह सरकार, यही जवाब आसानी से दे दिया जाता है । पर तब भी वह भूल जाता है कि सरकार उसी ने चुनी है तो सरकार उसी की तो हुई ना । यह सोच के संक्रमण का नतीजा है- यदि सरकार आपकी है तो आपसे उसका संवाद जरूरी है । ऐसी ही पावन मंशा से मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान अपने प्रदेश की उसी जनता से रूबरू होने, उनसे एक सहज संवाद कायम करने के उद्देश्य से एक प्यार भरा आव्हान करते हुए गणतंत्र दिवस के पावन प्रसंग पर आगामी 26 जनवरी से निकल रहे हैं- प्रदेश के गाँव - गाँव की उन गलियों,मोहल्लों,खेतों-खलिहानों से होते हुए जो अपने हैं , यह कहते हुए कि आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश । यानि कि अपने मध्यप्रदेश के विकास को नई दिशा दें, नए आयाम दें और समृद्व,स्वस्थ, सम्पन्न और शक्तिशाली प्रदेश के रूप में विकसित करें ।
इसी कड़ी में पहले मुख्यमंत्री ने अलग-अलग वर्ग के लोगों को अपने घर बुलाया - आओ और बताओं की तर्ज पर । अब वे गली,मोहल्लों,चौराहों, चबूतरों, खेतो, खलिहानों में खुद जा रहे हैं । प्रदेश के हित में आप क्या सोचते हैं मिलिए और बताईए मुझे ..........? एक अद्भुत सोच है यह । ग्राम स्वराज,भूदान आंदोलन,सरकार आपके द्वारा सबका मिला जुला सोच । अगर जनता चाहे तो इसका लाभ उठाए और अपने आसपास की समस्याएं और अगर निदान भी सुझाव के तौर पर बताए तो शायद यह यात्रा सार्थकता को पाने में एक महत्वपूर्ण कदम होगी । ऐसी महत्वपूर्ण यात्रा की पहली शुरूआत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 26 जनवरी,2010 से प्रारंभ करने जा रहे हैं । इसकी शुरूआत वे मध्यप्रदेश की जीवन रेखा पवित्र माँ नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से कर रहे हैं । वे ऐसी यात्रा हफ्ते में दो बार प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों के भ्रमण के रूप में करेंगे ।
यात्रा का मूलमंत्र रहेगा आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश । यह यात्रा समर्पित रहेगी मध्यप्रदेश के उस समाज को जो आम आदमी से बनता है जो किसी से उपकृत होने के बजाए अपने खेतों में पसीने की बूंदों को निचोड कर मोती से दाने उगाता है, जो कठोर श्रम से अपने शरीर को तपाता है, जो जागृत नागरिक कहलाना चाहता है, जो मुख्य मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के आव्हान पर अपने प्रदेश का मेहनत से विकास करना चाहता है । यह यात्रा उनके लिए है जिनका यह प्रदेश है । मुख्यमंत्री इस नए संकल्प को गणतंत्र दिवस से शुरू कर रहे हैं यह हमें याद दिलाता है कि गणतंत्र का सही अर्थ आम जन को एक साथ जोड़कर ही बन सकता है एक तंत्र अर्थात एक सुव्यवस्था । विकास की भागीदारी में समाज की महती भूमिका और समाज में आयी जागृति से ही संभव है एक समृद्ध सम्पन्न,स्वस्थ,सुशिक्षित हरे-भरे प्रदेश की परिकल्पना का साकार होना ।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस अभियान को कुछ यूँ देखा है जैसे वे कहना चाहते हैं "सेव नेशनल हार्ट " । हाँ देश का दिल हमारे पास है हमारा प्रदेश । इसकी हार्टबीट कुछ ऐसी हो कि पूरे देश में विकास की धड़कन सुनाई दे । इस हार्ट की पंपिंग ऐसी हो कि विकास की धाराएं देश की रगों में हमसे होकर बहें । यह दिल गाए तो पूरा देश सुने । दिल तभी झूम कर गाता है जब वह प्रसन्न होता है - हम सब मिल वही खुशहाली लाएं जो विकस की रागिनी बन कर गूंज उठें । यह अनूठा प्रसंग बन सकता है । मध्यप्रदेश को समृद्ध और विकसित राज्य बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वयं को पुनर्संकल्पित करने पर । सतपुड़ा और विंध्याचल के मध्य हम हैं, हमारा मध्यप्रदेश है, वही मध्यप्रदेश जिसे प्रकृति हीरे की खदानें दी हैं । हरे भरे जंगल हैं । हजारों जड़ी - बूटियों की संजीवनी दी है । पुरावैभव का अद्भुत सौन्दर्य यहाँ साँची, खजुराहो, माण्डव, भीमबेटिका जैसी सम्पदा है तो नर्मदा की पावन घाटी भी । जहाँ महाकाल और ममलेश्वर (ओंकारेश्वर) जैसे दो ज्योतिर्लिंग के मध्य औद्योगिक, व्यावसायिक शहर इंदौर है तो भोपाल जैसी सौन्दर्ययुक्त राजधानी । क्या नहीं है हमारे पास मालवा की काली मिटटी भरा पठार है तो तपते हुए निमाड़ की गरमाहर भी है । हम समृद्व हैं, हम सम्पन्न हैं- आवश्यकता अपने प्रदेश की उर्वरकता,सम्पन्नता,समृद्वता को पहचानने की है- यह पहचान करने के लिए चाहिए दृष्टिकोण में परिवर्तन एक सकारात्मक सोच - मुख्यमंत्री आओ बनाएं अपना प्रदेश के आव्हान के साथ हमारी सोच हमारी विचाराधीन को सकारात्मक प्रवाह देने निकल रहे हंै । वे कहते हैं कि हमने विकास किया है लेकिन उन्नति और प्रगति की बहुत सी संभावनाएँ अभी खुली हुई हैं । प्रदेश को विकसित राज्यों की अग्रपांत में ले जाकर खड़ा करने के लिए उन्हें जनता का साथ चाहिए एक व्यापक सर्वानुमति तैयार किये जाने की जरूरत हैं । यहाँ राजनीतिक सौजन्य की एक लम्बी परम्परा हैं । प्रदेश के हित में सब दल एक हो जाने की परम्परा यह अभियान उसी परम्परा के निर्वाह से सफलता की दिशा में एक पहल है । आप जहाँ है सरकार वहाँ है- हम आपके पास है आप अपनी जगह से ही प्रदेश के प्रति अपने-अपने कर्तव्यों को पूरा करें । सरकार और समाज एक साथ खडे होंगे तो प्रदेश के नवनिर्माण के सपने स्वमेव ही साकार होने लगेंगे । चूंकि मध्यप्रदेश में आसपास के अनेक राज्यों के हिस्से आकर मिले जिसके कारण वहां की विविध संस्कृतियां यहां रहीं । इसके कारण मध्यप्रदेश की अपनी स्वयं की कोई एक सांस्कृतिक पहचान कायम नहीं हो पाई और लोगों में ' मध्यप्रदेशियत' का जज्बा नहीं बन पाया । राज्य की स्थापना के कुछ समय तक यह बात काफी हद तक सही भी रही लेकिन अब ऐसा नहीं है । आज प्रदेश के विभिन्न अंचलों में रहने वाले लोग स्वयं को मध्यप्रदेश का वासी होने पर गर्व का अनुभव करते हैं और उसे विकास के लिये पूरी निष्ठा से काम भी कर रहे हैं ।
भारतीय संस्कृति और संस्कारों में सबसे ऊपर है अपनापन और अपनत्व भाव । जैसे मन अपना, घर अपना, वैसा ही देश अपना प्रदेश अपना । जरूरत है तो बस एक अहसास के साथ अपने प्रदेश को अपना समझने और समझाने की और अगर हम अपनी चीज पर अपना हक खोने लगे तो याद दिलाने में हर्ज ही क्या है ? हक तो याद रहते हैं व्यक्ति को भूलता तो वह दायित्व है- हम सब जानते है जहाँ हक होते हैंै वहीं दायित्व भी होते हैं । ये प्रदेश तो हमारा है ही तो दायित्व भी हमारे ही हैं । इतनी सी बात है यह, अगर हर व्यक्ति की समझ में आ जाए तो मध्यप्रदेश को देश में नम्बर एक प्रदेश बनने में देर नहीं लगेगी - यही बात समझाने की कोशिश है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की ।
भारत का लम्बा इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी समाज ही वहन करता आया है । रियासत काल हो या लोकतांत्रिक सरकारों का समय, समाज हर काम के लिए सरकार पर आश्रित नहीं रहता । विकास गंगा में बूंद-बूंद की तरह आमजन की भागीदारी जरूरी होती है । आज का दौर आपाधापी का दौर है - भागमभाग का, जिसके चलते व्यक्ति में यह धारणा घर करती चली गई है कि मेरा काम अपने लिए सोचना है । प्रदेश के विकास के लिए सरकार सोचेगी । सरकार कौन ? जो सत्ता में है वह सरकार, यही जवाब आसानी से दे दिया जाता है । पर तब भी वह भूल जाता है कि सरकार उसी ने चुनी है तो सरकार उसी की तो हुई ना । यह सोच के संक्रमण का नतीजा है- यदि सरकार आपकी है तो आपसे उसका संवाद जरूरी है । ऐसी ही पावन मंशा से मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान अपने प्रदेश की उसी जनता से रूबरू होने, उनसे एक सहज संवाद कायम करने के उद्देश्य से एक प्यार भरा आव्हान करते हुए गणतंत्र दिवस के पावन प्रसंग पर आगामी 26 जनवरी से निकल रहे हैं- प्रदेश के गाँव - गाँव की उन गलियों,मोहल्लों,खेतों-खलिहानों से होते हुए जो अपने हैं , यह कहते हुए कि आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश । यानि कि अपने मध्यप्रदेश के विकास को नई दिशा दें, नए आयाम दें और समृद्व,स्वस्थ, सम्पन्न और शक्तिशाली प्रदेश के रूप में विकसित करें ।
इसी कड़ी में पहले मुख्यमंत्री ने अलग-अलग वर्ग के लोगों को अपने घर बुलाया - आओ और बताओं की तर्ज पर । अब वे गली,मोहल्लों,चौराहों, चबूतरों, खेतो, खलिहानों में खुद जा रहे हैं । प्रदेश के हित में आप क्या सोचते हैं मिलिए और बताईए मुझे ..........? एक अद्भुत सोच है यह । ग्राम स्वराज,भूदान आंदोलन,सरकार आपके द्वारा सबका मिला जुला सोच । अगर जनता चाहे तो इसका लाभ उठाए और अपने आसपास की समस्याएं और अगर निदान भी सुझाव के तौर पर बताए तो शायद यह यात्रा सार्थकता को पाने में एक महत्वपूर्ण कदम होगी । ऐसी महत्वपूर्ण यात्रा की पहली शुरूआत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 26 जनवरी,2010 से प्रारंभ करने जा रहे हैं । इसकी शुरूआत वे मध्यप्रदेश की जीवन रेखा पवित्र माँ नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से कर रहे हैं । वे ऐसी यात्रा हफ्ते में दो बार प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों के भ्रमण के रूप में करेंगे ।
यात्रा का मूलमंत्र रहेगा आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश । यह यात्रा समर्पित रहेगी मध्यप्रदेश के उस समाज को जो आम आदमी से बनता है जो किसी से उपकृत होने के बजाए अपने खेतों में पसीने की बूंदों को निचोड कर मोती से दाने उगाता है, जो कठोर श्रम से अपने शरीर को तपाता है, जो जागृत नागरिक कहलाना चाहता है, जो मुख्य मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के आव्हान पर अपने प्रदेश का मेहनत से विकास करना चाहता है । यह यात्रा उनके लिए है जिनका यह प्रदेश है । मुख्यमंत्री इस नए संकल्प को गणतंत्र दिवस से शुरू कर रहे हैं यह हमें याद दिलाता है कि गणतंत्र का सही अर्थ आम जन को एक साथ जोड़कर ही बन सकता है एक तंत्र अर्थात एक सुव्यवस्था । विकास की भागीदारी में समाज की महती भूमिका और समाज में आयी जागृति से ही संभव है एक समृद्ध सम्पन्न,स्वस्थ,सुशिक्षित हरे-भरे प्रदेश की परिकल्पना का साकार होना ।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस अभियान को कुछ यूँ देखा है जैसे वे कहना चाहते हैं "सेव नेशनल हार्ट " । हाँ देश का दिल हमारे पास है हमारा प्रदेश । इसकी हार्टबीट कुछ ऐसी हो कि पूरे देश में विकास की धड़कन सुनाई दे । इस हार्ट की पंपिंग ऐसी हो कि विकास की धाराएं देश की रगों में हमसे होकर बहें । यह दिल गाए तो पूरा देश सुने । दिल तभी झूम कर गाता है जब वह प्रसन्न होता है - हम सब मिल वही खुशहाली लाएं जो विकस की रागिनी बन कर गूंज उठें । यह अनूठा प्रसंग बन सकता है । मध्यप्रदेश को समृद्ध और विकसित राज्य बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वयं को पुनर्संकल्पित करने पर । सतपुड़ा और विंध्याचल के मध्य हम हैं, हमारा मध्यप्रदेश है, वही मध्यप्रदेश जिसे प्रकृति हीरे की खदानें दी हैं । हरे भरे जंगल हैं । हजारों जड़ी - बूटियों की संजीवनी दी है । पुरावैभव का अद्भुत सौन्दर्य यहाँ साँची, खजुराहो, माण्डव, भीमबेटिका जैसी सम्पदा है तो नर्मदा की पावन घाटी भी । जहाँ महाकाल और ममलेश्वर (ओंकारेश्वर) जैसे दो ज्योतिर्लिंग के मध्य औद्योगिक, व्यावसायिक शहर इंदौर है तो भोपाल जैसी सौन्दर्ययुक्त राजधानी । क्या नहीं है हमारे पास मालवा की काली मिटटी भरा पठार है तो तपते हुए निमाड़ की गरमाहर भी है । हम समृद्व हैं, हम सम्पन्न हैं- आवश्यकता अपने प्रदेश की उर्वरकता,सम्पन्नता,समृद्वता को पहचानने की है- यह पहचान करने के लिए चाहिए दृष्टिकोण में परिवर्तन एक सकारात्मक सोच - मुख्यमंत्री आओ बनाएं अपना प्रदेश के आव्हान के साथ हमारी सोच हमारी विचाराधीन को सकारात्मक प्रवाह देने निकल रहे हंै । वे कहते हैं कि हमने विकास किया है लेकिन उन्नति और प्रगति की बहुत सी संभावनाएँ अभी खुली हुई हैं । प्रदेश को विकसित राज्यों की अग्रपांत में ले जाकर खड़ा करने के लिए उन्हें जनता का साथ चाहिए एक व्यापक सर्वानुमति तैयार किये जाने की जरूरत हैं । यहाँ राजनीतिक सौजन्य की एक लम्बी परम्परा हैं । प्रदेश के हित में सब दल एक हो जाने की परम्परा यह अभियान उसी परम्परा के निर्वाह से सफलता की दिशा में एक पहल है । आप जहाँ है सरकार वहाँ है- हम आपके पास है आप अपनी जगह से ही प्रदेश के प्रति अपने-अपने कर्तव्यों को पूरा करें । सरकार और समाज एक साथ खडे होंगे तो प्रदेश के नवनिर्माण के सपने स्वमेव ही साकार होने लगेंगे । चूंकि मध्यप्रदेश में आसपास के अनेक राज्यों के हिस्से आकर मिले जिसके कारण वहां की विविध संस्कृतियां यहां रहीं । इसके कारण मध्यप्रदेश की अपनी स्वयं की कोई एक सांस्कृतिक पहचान कायम नहीं हो पाई और लोगों में ' मध्यप्रदेशियत' का जज्बा नहीं बन पाया । राज्य की स्थापना के कुछ समय तक यह बात काफी हद तक सही भी रही लेकिन अब ऐसा नहीं है । आज प्रदेश के विभिन्न अंचलों में रहने वाले लोग स्वयं को मध्यप्रदेश का वासी होने पर गर्व का अनुभव करते हैं और उसे विकास के लिये पूरी निष्ठा से काम भी कर रहे हैं ।
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