मध्य प्रदेश मध्य भारत का राज्य है, इसकी राजधानी भोपाल है । मध्य प्रदेश 1 नवंबर, २००० तक क्षेत्रफल के आधार पर भारत का सबसे बडा राज्य था। इस दिन छत्तीसगढ़ की स्थापना हुई थी। मध्य प्रदेश की सीमाऐं महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, छत्तीसभारत की संस्कृति में मध्यप्रदेश जगमगाते दीपक के समान है, जिसकी रोशनी की सर्वथा अलग प्रभा और प्रभाव है। विभिन्न संस्कृतियों की अनेकता में एकता का जैसे आकर्षक गुलदस्ता है, मध्यप्रदेश, जिसे प्रकृति ने राष्ट्र की वेदी पर जैसे अपने हाथों से सजाकर रख दिया है, जिसका सतरंगी सौन्दर्य और मनमोहक सुगन्ध चारों ओर फैल रहे हैं। यहाँ के जनपदों की आबोहवा में कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास तैरती रहती है। यहाँ के लोक समूहों और जनजाति समूहों में प्रतिदिन नृत्य, संगीत, गीत की रसधारा सहज रुप से फूटती रहती है। यहाँ का हर दिन पर्व की तरह आता है और जीवन में आनन्द रस घोलकर स्मृति के रुप में चला जाता है। इस प्रदेश के तुंग-उतुंग शैल शिखर विन्ध्य-सतपुड़ा, मैकल-कैमूर की उपत्यिकाओं के अन्तर से गूँजते अनेक पौराणिक आख्यान और नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान, तवा नदी, ताप्ती आदि सर-सरिताओं के उद्गम और मिलन की मिथकथाओं से फूटती सहस्त्र धाराएँ यहाँ के जीवन को आप्लावित ही नहीं करतीं, बल्कि परितृप्त भी करती हैं।



मध्यप्रदेश में पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है। ये पाँच साँस्कृतिक क्षेत्र है-1.निमाड़ .बघेलखण्ड

2.मालवा3.बुन्देलखण्ड5.ग्वालियर



प्रत्येक सांस्कृतिक क्षेत्र या भू-भाग का एक अलग जीवंत लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, कला, बोली और परिवेश है। मध्यप्रदेश लोक-संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान श्री वसन्त निरगुणे लिखते हैं- "संस्कृति किसी एक अकेले का दाय नहीं होती, उसमें पूरे समूह का सक्रीय सामूहिक दायित्व होता है। सांस्कृतिक अंचल (या क्षेत्र) की इयत्त्ता इसी भाव भूमि पर खड़ी होती है। जीवन शैली, कला, साहित्य और वाचिक परम्परा मिलकर किसी अंचल की सांस्कृतिक पहचान बनाती है।"



मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।

निष्कर्षत: मध्यप्रदेश पाँच सांस्कृतिक क्षेत्र निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड और ग्वालियर और धार-झाबुआ, मंडला-बालाघाट, छिन्दवाड़ा, होसंगाबाद, खण्डवा-बुरहानपुर, बैतूल, रीवा-सीधी, शहडोल आदि जनजातीय क्षेत्रों में विभक्त है।






























































































































































































































Thursday, February 18, 2010

अस्तित्व से व्यक्तित्व गढ़ रहा शिल्पी

-स्वाति तिवारी
मध्यप्रदेश में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक सामाजिक और सरकारी क्रान्ति का सूत्रपात हुआ हैं । महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य है कि महिला अपने अस्तित्व की स्थापना करके अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके अर्थात महिला की पहचान होना पहली शर्त है । किन्तु जब अस्तित्व ही नहीं होता तो व्यक्तित्व के विकास की बात निरर्थक लगती है । भारत की अनेक महिलाओं का जीवन स्तर मानवीय श्रेणी के मापदंडों से काफी निम्न रहा है । फारवर्ड वुमन ऑफ इंडिया में फ्रान्स के एक प्रसिद्ध लेखक ने लिखा था कि किसी भी देश की स्थिति को देखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है, उस देश की स्त्रियों की स्थिति का पता लगाना ।
मध्यप्रदेश सरकार ने अपने प्रदेश के विकास के लिये इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं । स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में कौशिशे अब तक कईयों ने की लेकिन वह सब नारों, झंडों और बेनरों में उलझ कर रह गए जबकि जरूरत थी ठोस जमीनी प्रयासों की । मध्यप्रदेश में महत्वाकांक्षी लाड़ली लक्ष्मी, कन्यादान,जननी सुरक्षा और समानता एंव बराबरी का हक अर्थात महिलाओं को स्थानीय निकाय चुनावों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर शिवराज सरकार ने यह जता दिया है कि वे पहले महिलाओं का अस्तित्व बनाने के लिए कटिबद्ध हैं । देश के इतिहास में पहली बार महिलाओं को इतने व्यापक रूप में सत्ता में भागीदारी मिली है । एक तरफ देश में लम्बे समय से महिला आरक्षण की बात और बहस चल रही है, लेकिन कोई उस पर एकमत नहीं हो पा रहे हैं, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने पूरी ईमानदारी के साथ स्थानीय संस्थाओं में उन्हें बराबरी का भागीदार बनाकर महिला शक्ति के प्रति अपनी भावनाएं और निष्ठा का परिचय दे दिया । यह एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ आम तौर पर पुरूष किसी सूरत में महिला को हम सफर बनाना पसंद नहीं कर रहा था । वह उसे चौके-चूल्हे तक सीमित देखना चाहता था, लेकिन हवा का रूख बदला और मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों और पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर भाजपा सरकार ने अपने इरादे जाहिर कर दिए ।
त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं को वित्तीय और प्रशासनिक ॰ष्टि से सशक्त बनाने और इसके माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण के परिणामों पर नजर डाले तो चौकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं । मध्यप्रदेश में एक शान्त क्रान्ति के रूप में गांवों और शहरों के विकास के लिए सत्ता की बागडोर दो लाख से ज्यादा महिलाओं के हाथ में हो गयी है । संविधान निर्माताओं के सपनों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि कुछ इस तरह से दिखाई देती है -एक लाख 80 हजार महिला पंच, 11
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हजार 320 महिला सरपंच, 3400 महिला जनपद सदस्य, 415 महिला जिला पंचायत सदस्य, 156 जनपदों और 25 जिला पंचायतों में महिला अध्यक्ष, 1780 महिला पार्षद, 95 नगर पंचायत महिला अध्यक्ष, 32 नगर पालिका महिला अध्यक्ष,8 नगर निगमों में महिला महापौर, यह तो हुआ तस्वीर का एक पहलू,अब दूसरे पर भी नजर दौड़ाए- शिवराज सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना को देश भर में सराहा गया। इस अद्भुत योजना के तहत आंगनवाड़ी योजना में पंजी.त,परिवार नियोजन अपना चुके और दो बच्चों तक वाली दंपति यदि आयकर नहीं भरती है और उनकी एक संतान लड़की है या दूसरी संतान जुड़वा लड़की भी है तो दोनों के नाम 30 हजार रूपए के राष्ट्रीय बचत पत्र खरीद कर उन्हें दे दिए जाएंगे। जिनके ब्याज से वे छठी,नवमी,ग्यारवीं और बारहवीं में क्रमशः 2 हजार, 4 हजार, साढे सात हजार तथा दो वर्ष तक 200 रूपए माह रकम मिलेगी । साथ बालिग होने पर शादी के बाद करीब एक लाख रूपए से ज्यादा मिलेगा । गरीब, कमजोर वर्ग के लिए यह योजना किसी वरदान से कम नहीं । जहां एक तरफ इस कन्या की शिक्षा की व्यवस्था हो जाएगी, वहीं दूसरी तरफ उसके व्याह का भी इंतजाम हो जाएगा । इस योजना के तहत प्रदेश में वर्ष 2010 के आखिर तक करीब 2 लाख लाड़लियां लाभान्वित हो जाएंगी । सोचिए ये कन्याएं और उनके अभिभावक सरकार को कितनी दुआएं देंगे ।
इसी तरह मुख्यमंत्री कन्या योजना के तहत करीब 75 हजार गरीब कन्याओं का विवाह कराया जा चुका है । शिवराज सरकार का यह एक ऐसा अनुपम प्रयास है जिसमें भी उसे ढेर सारी दुआएं मिलती हैं । हालांकि शिवराज सरकार यह सिर्फ यश और दुआओं के लिए नहीं कर रही बल्कि वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी खूब समझती है । वह जानती है कि इस प्रदेश में गरीबों की बहुलता है, जहाँ दो वक्त की रोटी का प्रबंध करना ही टेढ़ी खीर होता है वहाँ शादी-व्याह जैसे संस्कारों के लिए भला कहाँ से अतिरिक्त धन आ सकता है ? ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी गरीब कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा था, लेकिन यह किसने देखा कि तब वह कितने कर्ज में डूबकर और हाथ खींचकर बेटी को बिदा करता था जबकि अब वह खुशी-खुशी इसे अंजाम देता है ।
ठीक इसी तरह जननी सुरक्षा योजना के तहत शिवराज सरकार ने प्रदेश भर की 17 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसूति के लिए मदद उपलब्ध कराई । पहले अनेक प्रसूताएं अस्पताल पहुंचने से पहले ही या इलाज के अभाव में घर पर ही दम तोड़ देती थी । इस सिलसिले पर अब काफी हद तक विराम लगा है ।
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इससे शिशु मृत्यु दर पर तो रोक लगी ही, साथ ही प्रसूताओं की मृत्यु दर पर भी रोक लगी है ।
ये वे चुनिन्दा काम है, जो आम तौर पर प्रचारित हो जाते हैं या फिर लाभान्वित लोग ही इसकी चर्चा कर देते हैं लेकिन परदे के पीछे भी यह सरकार ऐसे अनगिनत कामों को अंजाम दे रही है, जो जन कल्याण से जुडे हैं किन्तु उनका जिक्र कम ही होता है । पिछले चार वर्षो में मध्यप्रदेश ने बेहद भिन्न तरीके से विकास की रफ्तार तय की है । ऐसा महसूस होने लगा है कि प्रदेश में कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो उल्लेखनीय है । यह साफ दिख रहा है कि जनता की नव्ज पहचान ली गई है और उसके मुताबिक ही उपचार किया जा रहा है । यही वहज है कि यह प्रदेश स्वस्थ, खुशहाल और विकासोन्मुख होता रहा है ।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल
संपर्क 9424011334,९४२५०५६५०५
राज एक्सप्रेस भोपाल में प्रकाशित दिनांक १९/०२/10



नदी भी खुश है, पीपल वाला चौपाल भी
- स्वाति तिवारी
आजकल माँ नर्मदा बहुत खुश है । हाँ, लोगों ने बताया इसका निर्मल पारदर्शी पानी अपने भविष्य को लेकर अब निश्ंिचत लग रहा है । कल -कल बहती हुई माँ नर्मदा अपने दोनों किनारों पर आने वाली तीन-तीन पीढी की दादी,नानी,माँ,सासू माँ, बहन-बेटी,बहुओं से कहते सुनी जा रही हैै कि प्रदेश के मुखिया ने सबसे पहले मेरे द्वार पर दस्तक दी .........बताओ अब तक पहले आया कोई ऐसा मुख्यमंत्री ?
सुनने वाली नानी-दादी, बहू-बेटियाँ सब वाह करते हुए आश्चर्य से देखती हैं नर्मदा के खिलखिलाते प्रवाह को ..............''अच्छा । ''
हाँ । मैं आज धन्य हूँ । ऐसा तो कोई सुयोग्य, समझदार और कर्मठ बेटा ही कर सकता है । किनारे-किनारे आने वाली भीड़ ने पूछा ऐसा क्या किया मुख्यमंत्री जी ने ?
अरे वाह । ऐसे बन रहे हैं सब जैसे जानते ही नहीं ? मुझे पता है वह तुम सबके द्वारे भी जा रहा है। मुझे यह भी पता है कि उसने लाड़ली लक्ष्मी,अन्नपूर्णा,सबकी चिन्ता की है । पिछले हफ्ते ही तो रामसिंह बताने आया था कि उसकी सयानी बिटिया का कन्यादान हो गया - सबके पीछे शिव है । पर मैं तो खुश हूँ वह सबसे पहले माँ की गोद में आया - आशीर्वाद लेने । और यही से लिया गया पहला संकल्प मुझे प्रदूषण से मुक्त करने का अपने लाव लश्कारे के साथ यहीं से निकला है प्रदेश को नया स्वरूप देने । विकास यात्रा पर, उसकी यह यात्रा सफल हो यही कामना है मेरी । माँ नर्मदा का निर्मल जल भी इन दिनों शिवराग की रव निकाल रहा है। निकाले भी क्यूं नहीं, नर्मदा का शिव से और शिव का नर्मदा से रिश्ता सब जानते हैं ।
यूँ तो नर्मदा का हर कंकर शंकर कहलाता है, पर शिवराज की बात ही और है । मध्यप्रदेश के चहुमुखी विकास के नारे को लेकर प्रदेश सरकार के साथ वे चले हैं । ताल-तलैया,घाट-किनारे, गाँव की गलियों में यह कहते हुए कि मैं कुछ देने नहीं, माँगने आया हूँ । देने को तो राजधानी में ऐलान करके भी देते ही हैं पर वहाँ बैठ कर आम आदमी से जुड़ाव तो नहीं हो सकता ना । जनमत नहीं बन सकता । इतिहास की तरह नर्मदा भी कई राजाओं-प्रजाओं की साक्षी है । वह कहती है कि मुखिया तो ऐसा ही होना चाहिए जो जनता के बीच जाए तो दूध में शक्कर की तरह घुल जाए । खेत में जाए तो हल चलाए, सड़क पर कचरा देखे तो बुहार लगाए,थका मजदूर पसीना पोछे तो उसके माथे रखी तगार को हाथ लगाए, स्कूल जाए तो मास्टरजी बन जाए, घर-घर जाए, गुड़ की डली खाए । भू-माफिआ दिखे तो बाहुबली सरकार में बदल जाए । उसके दिल में अपनी जनता के लिए प्यार है तो विकास में बाधक तत्वों के विनाश के लिए ताकत भी । जब तक मुखिया गाँव- गाँव नहीं घूमता तब तक नाम का मुखिया होता है, जनता से उसका सीधे रिश्ता होना संभव ही नहीं होता । पर सही मायने में नेता सफल वही होता रहा है जो अपनी आँखों से जनता का हाल देखे,उनके दुखदर्द सुने, समझे और समस्याओं के यथा संभव समाधान भी निकाले । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकार और समाज को जोड़ने के अभियान के साथ पूरे देश में एक नयी छबि के साथ उभरे हैं । राज्य सरकार ने सात प्राथमिकताएँ क्रमशः खेती को लाभ का धंधा बनाना, निवेश में वृद्धि, अधोसंरचना विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण,सुशासन और सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था निर्धारित की है । इनकी पूर्ति के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाकर कार्य किया जा रहा है ।
यह निःसन्देह पहली बार है कि इतने व्यापक स्तर पर इतने संगठित तरीके से कोई मुख्यमंत्री प्रदेश में जनमत के साथ नई इबारत लिख रहे है । इससे पहले शिवराज जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तब जनदर्शन यात्राएं की थी । इस बार अमरकंटक से शुरू करके अब तक वे डिडोंरी, अलीराजपुर,झाबुआ और बैतूल जिलों की यात्रा कर चुके हैंै । इन जिलों के दूरदराज के लगभग दुर्गम गाँवों में उन्होंने रात्रि विश्राम भी किया । अब तो गाँव का पीपल के नीचे बना चौपाल भी खुश है कि प्रदेश के सर्वेसर्वा वहाँ बैठ कर बतिया रहे हैं । कुछ कहते है, कुछ सुनते है । स्कूल में बच्चों को उनके रूप में एक योग गुरू के दर्शन भी हुए है । वे योग के माध्यम से प्रदेश के कर्णधारों को स्वस्थ्य बनाना चाहते हैं । ग्रामीण परिवेश को स्वच्छ बनाए रखने के लिए मुख्यमंत्री स्वयं झाडू हाथ में उठाकर गाँव की गलियों में सफाई करते हुए लोगों से पर्यावरण सुरक्षा का संकल्प ले रहे हैं । आँगनवाडी में बटने वाले आहार का जायजा ले रहे हैं ।
अब हाथठेला वाला हो या सायकल रिक्शा चालक, हमारे घरों में काम करने वाली घरेलू नौकर हो चाहे पत्थर तोड़ती मजदूर सब अपनी बात अपने शिवभैया से कहने सुनने लगे है । गरीब और मजदूर हो चाहे किसान उनका दर्द अगर मुख्यमंत्री ध्यान से सुन रहे है तो दर्द का अहसास कुछ यूँ ही कम हो जाता है । लोग कहते है प्रदेश की बागडोर ऐसे नेता को मिली हैं जो प्रदेश के एक कोने से दूसरे कोने तक की दूरी कदमों से नाप रहा है । एक अलग पहचान है अब उनकी लोग उन्हें कहते है पाँव -पाँव वाला भैया । इस बार उनकी यात्रा जनजागरण के लिए चर्चित हो रही है । सच यह है कि मध्यप्रदेश अपना तभी बनेगा जब अपने प्रतिनिधि अपनों के बीच जायेंगे । तब नदियाँ गाएँगी गीत प्रवाह के खेत लहलहाएंगे सरसों,कपास,गेहू बाजरे के विभिन्न रंगों से, तब बच्चा माँ से जिद करेगा मुझे स्कूल जाना है । आज बडे सर कसरत सिखाएंगे, किसान की पत्नी उसके खाने की पोटली में चटनी,रोटी के साथ गुड़ की डली भी रखेगी क्या पता कब शिव भैया आकर सुदामा की पोटली खोल कर देख ले तो, क्या सोचेंगे वे ? आतिथ्य की मिठास मेजबान की उजास होती है - यही हमारी परम्परा है हमारा संस्कार - नर्मदा भैया ने तो पूरी शिवपुराण सुना दी तब किनारे पर खड़ी भीड़ ने कहा नर्मद हर और नर्मदा ने कहा आज तो सब बोलों जय मध्यप्रदेश - अपना प्रदेश ।
कितने आश्चर्य की बात है नदी अपने निर्धारित रास्ते पर बहती है । वह किसी के घर नहीं जाती पर उसे सब पता है ? प्रश्न उठता है कैसे ?
अरे भाई वह नहीं जाती तो क्या हुआ लोक दुख दर्द लेकर मान मिन्नत करने और खुशियों में नारियल,चुनरियाँ चढ़ाने नदी किनारे ही तो आते है वह घर घर की बात सुनती है वही साक्षी है जीवन प्रवाह की ।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल
संपर्क 9424011334,9425056505 १८ /०२/१९१० को दैनिक जागरण में प्रकाशित



Friday, February 5, 2010

भगवान पराशुरामतीर्थ [ मध्यप्रदेश सन्देशमें प्रकाशित]



जन्मस्थली जानापाव बनेगा राष्ट्रतीर्थ
डा.स्वाति तिवारी
विकास का ऐसा खाका होना चाहिए जहां बुनियादी क्षेत्र सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र को बराबर का महत्व मिले और किसी भी क्षेत्र की उपेक्षा न हो। समाज का कोई भी वर्ग अनदेखा, अनसुना ना रहे।
मध्यप्रदेश के संदर्भ में हम अगर इस बात को गौर करें तो हम पायेंगे कि मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी वर्गों की भलाई और खुशहाली के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। ऐसे में जब उनकी नजर ब्राम्हणों के आराध्यदेव परशुराम की जन्मस्थली जानापाव पर पड़ी तो उन्होंने इस पावन स्थली को, जो पावन जलाशय और सात नदियों का उद्गम स्थल है, के विकास की ठानी।
ब्राम्हणों के साथ-साथ सभी वर्गो की आस्था और भावनाओं का सम्मान ही है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं 8 मई गुरूवार को भगवान परशुराम के पराक्रम पुरूषार्थ और परमार्थ को माथा टेकने पहुंचे हैं और पावन तीर्थ के जीर्णोद्धार के साथ-साथ इस स्थान को नया स्वरूप प्रदान करने के लिए संकल्पित दिखाई दिये

हैं।
देश में अनेक ऐसे महापुरूष हुए हैं, जिनके जन्म तथा जीवनलीला से जुड़े स्थान सदियों से उपेक्षित रहे हैं। भारत के महानतम पुरूषों में से एक भगवान परशुराम की जन्मस्थली भी इसी श्रेणी में आती है।
सांस्कृतिक धरोहर तथा धार्मिक चेतना से परिपूर्ण श्री शिवराज सिंह चौहान पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने इन्दौर जिले में महू के पास जानापाव नाम के इस स्थल का जीर्णोद्धार कर वहां भगवान परशुराम पीठ की स्थापना का बीड़ा उठाया है। विन्ध्याचल की उपत्यकाओं के बीच महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका की तपःस्थली तथा विश्वपूज्य भगवान परशुराम की जन्मस्थली को राष्ट्र-तीर्थ का स्वरूप प्रदान किया जा रहा है। इसके लिये करीब दो करोड़ रूपये की लागत की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की गई है। वहां वेदशाला, गौशाला, धर्मशाला एवं मंदिर के साथ-साथ जलकुंड का निर्माण किया जाएगा।
सात नदियों का उद्गम स्थल जानापाव, जहां चंबल और गंभीर जैसी पांच नदियां आज भी प्रवाहमान है, यहां जनकेश्वर महादेव का अति प्राचीन मंदिर और ताल है जो आस्था का बड़ा तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि माता रेणुका के नाम से बने रेणुका कुण्ड में स्नान करने से रोग, शोक एवं भय प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है। इस स्थल का पौराणिक एवं धार्मिक ही नहीं सामाजिक महत्व भी है। यहां कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को एक वार्षिक मेला लगता है। इस मेले में लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जिनमें पिछड़े वर्ग एवं आदिम जतियों के भी बहुत से लोग शामिल होते हैं। मंदिर के पीछे पत्थर का बना गो-मुख है जिससे झरने का जल निरन्तर झरता रहता है। कहा जाता है कि यह झरना ही चंबल नदी का उद्गम स्थल है। चंबल नदी भूगर्भवाहिनी नदी यानी धरती के अन्दर बहने वाली नदी माना जाता है कि कपिल मुनि के श्राप के कारण यह धरती के भीतर बहने लगी थी।
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इस स्थल का अन्य अनेक कारणों से भी महत्व है। इन्दौर से लगभग सैंतीस किलामीटर दूर, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की जन्मस्थली महू से यह सिर्फ 5 किलामीटर की दूरी पर स्थित है। विन्ध्याचल पर्वत श्र्त रेणुका कुंड में स्नान करने से रोग-शोक से मुक्ति मिलती है। इस कुंड के सम्मुख भगवान परशुराम की संगमरमर की एक विशाल प्रतिमा स्थापित कर उसके आसपास संपूर्ण स्थल की प्रकृति, पर्यटन, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में विकसित किया जाएगा। संपूर्ण विकास कार्य पांच चरणों में होगा। वन विभाग द्वारा वनस्पतियों, पक्षियों तथा अन्य प्राकृतिक संपदा का विकास किया जाएगा। साथ ही वहां एक आकर्षक पर्यटन केन्द्र, इकोटूरिज्म सेंटर और आधुनिक रेस्टोरेंट का निर्माण पर्यटन विकास निगम द्वारा किया जाएगा।
इसके अलावा संस्कृति एवं आदिवासी विकास विभाग द्वारा भी इस स्थल के विकास का कार्य किया जाएगा, क्योंकि यह आदिवासियों की आस्था और विश्वास का केन्द्र है। यहां आदिवासियों का मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। जल संसाधन विकास विभाग द्वारा चंबल नदी पर बांध का निर्माण किया जाएगा। आवागमन एवं स्थानीय सड़कों का निर्माण, पर्यटकों एंव दर्शनार्थियों के ठहरने के लिए धर्मशाला, कुटीरों आदि का निर्माण भी किया जाएगा।
आगरा-बांम्बे रोड से भगवान परशुराम की जन्मभूमि जानापाव आश्रम तक 12 फीट चौड़ी और साढ़े चार किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण किया जाएगा, जिस पर 50 लाख रूपये का व्यय होगा। पर्यटकों के लिये पेयजल एवं निस्तार के पानी की व्यवस्था के लिए सड़क किनारे जी.आई.पाइप लाइन बिछाई जाएगी तथा पानी की टंकी का निर्माण किया जाएगा। पानी की समस्या के स्थाई समाधान के लिए 60 लाख रूपये लागत से एक बांध का निर्माण किया जायेगा। इसके साथ ही पर्यटकों के स्नान के लिए 15 लाख रूपये लागत से एक जलकुंड भी बनाया जाएगा।
इसके अलावा, विद्युत व्यवस्था के लिए 10 लाख रूपये लागत से 100 हांर्सपावर का ट्रांसफार्मर लगाया जाएगा और थ्री फेस विद्युत लाइन बिछाई जाएगी। विश्राम गृह एवं धर्मशाला निर्माण पर 30 लाख रूपये खर्च होंगे। गंदे और बरसाती जल की निकासी के लिए तीन लाख रूपये की लागत से नालियों का निर्माण किया जाएगा। मंदिर की सीढ़ियों के निर्माण पर 5 लाख रूपये व्यय होंगे।
इन सब कार्यो के पूर्ण होने पर निश्चय ही आने वाले समय में जानापाव एक राष्ट्र-तीर्थ के रूप में जनश्रद्धा का बड़ा केन्द्र बनकर उभरेगा।
डा.स्वाति तिवारी

Thursday, February 4, 2010

देश का दिल अपना मध्यप्रदेश


दिल ऐसे धड़के की पूरी दुनिया सुने विकास के तराने

२६ जनवरी २०१० को दैनिकभास्कर ,राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित आलेख

- स्वाति तिवारी
भारतीय संस्कृति और संस्कारों में सबसे ऊपर है अपनापन और अपनत्व भाव । जैसे मन अपना, घर अपना, वैसा ही देश अपना प्रदेश अपना । जरूरत है तो बस एक अहसास के साथ अपने प्रदेश को अपना समझने और समझाने की और अगर हम अपनी चीज पर अपना हक खोने लगे तो याद दिलाने में हर्ज ही क्या है ? हक तो याद रहते हैं व्यक्ति को भूलता तो वह दायित्व है- हम सब जानते है जहाँ हक होते हैंै वहीं दायित्व भी होते हैं । ये प्रदेश तो हमारा है ही तो दायित्व भी हमारे ही हैं । इतनी सी बात है यह, अगर हर व्यक्ति की समझ में आ जाए तो मध्यप्रदेश को देश में नम्बर एक प्रदेश बनने में देर नहीं लगेगी - यही बात समझाने की कोशिश है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की ।
भारत का लम्बा इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी समाज ही वहन करता आया है । रियासत काल हो या लोकतांत्रिक सरकारों का समय, समाज हर काम के लिए सरकार पर आश्रित नहीं रहता । विकास गंगा में बूंद-बूंद की तरह आमजन की भागीदारी जरूरी होती है । आज का दौर आपाधापी का दौर है - भागमभाग का, जिसके चलते व्यक्ति में यह धारणा घर करती चली गई है कि मेरा काम अपने लिए सोचना है । प्रदेश के विकास के लिए सरकार सोचेगी । सरकार कौन ? जो सत्ता में है वह सरकार, यही जवाब आसानी से दे दिया जाता है । पर तब भी वह भूल जाता है कि सरकार उसी ने चुनी है तो सरकार उसी की तो हुई ना । यह सोच के संक्रमण का नतीजा है- यदि सरकार आपकी है तो आपसे उसका संवाद जरूरी है । ऐसी ही पावन मंशा से मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान अपने प्रदेश की उसी जनता से रूबरू होने, उनसे एक सहज संवाद कायम करने के उद्देश्य से एक प्यार भरा आव्हान करते हुए गणतंत्र दिवस के पावन प्रसंग पर आगामी 26 जनवरी से निकल रहे हैं- प्रदेश के गाँव - गाँव की उन गलियों,मोहल्लों,खेतों-खलिहानों से होते हुए जो अपने हैं , यह कहते हुए कि आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश । यानि कि अपने मध्यप्रदेश के विकास को नई दिशा दें, नए आयाम दें और समृद्व,स्वस्थ, सम्पन्न और शक्तिशाली प्रदेश के रूप में विकसित करें ।
इसी कड़ी में पहले मुख्यमंत्री ने अलग-अलग वर्ग के लोगों को अपने घर बुलाया - आओ और बताओं की तर्ज पर । अब वे गली,मोहल्लों,चौराहों, चबूतरों, खेतो, खलिहानों में खुद जा रहे हैं । प्रदेश के हित में आप क्या सोचते हैं मिलिए और बताईए मुझे ..........? एक अद्भुत सोच है यह । ग्राम स्वराज,भूदान आंदोलन,सरकार आपके द्वारा सबका मिला जुला सोच । अगर जनता चाहे तो इसका लाभ उठाए और अपने आसपास की समस्याएं और अगर निदान भी सुझाव के तौर पर बताए तो शायद यह यात्रा सार्थकता को पाने में एक महत्वपूर्ण कदम होगी । ऐसी महत्वपूर्ण यात्रा की पहली शुरूआत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 26 जनवरी,2010 से प्रारंभ करने जा रहे हैं । इसकी शुरूआत वे मध्यप्रदेश की जीवन रेखा पवित्र माँ नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से कर रहे हैं । वे ऐसी यात्रा हफ्ते में दो बार प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों के भ्रमण के रूप में करेंगे ।
यात्रा का मूलमंत्र रहेगा आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश । यह यात्रा समर्पित रहेगी मध्यप्रदेश के उस समाज को जो आम आदमी से बनता है जो किसी से उपकृत होने के बजाए अपने खेतों में पसीने की बूंदों को निचोड कर मोती से दाने उगाता है, जो कठोर श्रम से अपने शरीर को तपाता है, जो जागृत नागरिक कहलाना चाहता है, जो मुख्य मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के आव्हान पर अपने प्रदेश का मेहनत से विकास करना चाहता है । यह यात्रा उनके लिए है जिनका यह प्रदेश है । मुख्यमंत्री इस नए संकल्प को गणतंत्र दिवस से शुरू कर रहे हैं यह हमें याद दिलाता है कि गणतंत्र का सही अर्थ आम जन को एक साथ जोड़कर ही बन सकता है एक तंत्र अर्थात एक सुव्यवस्था । विकास की भागीदारी में समाज की महती भूमिका और समाज में आयी जागृति से ही संभव है एक समृद्ध सम्पन्न,स्वस्थ,सुशिक्षित हरे-भरे प्रदेश की परिकल्पना का साकार होना ।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस अभियान को कुछ यूँ देखा है जैसे वे कहना चाहते हैं "सेव नेशनल हार्ट " । हाँ देश का दिल हमारे पास है हमारा प्रदेश । इसकी हार्टबीट कुछ ऐसी हो कि पूरे देश में विकास की धड़कन सुनाई दे । इस हार्ट की पंपिंग ऐसी हो कि विकास की धाराएं देश की रगों में हमसे होकर बहें । यह दिल गाए तो पूरा देश सुने । दिल तभी झूम कर गाता है जब वह प्रसन्न होता है - हम सब मिल वही खुशहाली लाएं जो विकस की रागिनी बन कर गूंज उठें । यह अनूठा प्रसंग बन सकता है । मध्यप्रदेश को समृद्ध और विकसित राज्य बनाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वयं को पुनर्संकल्पित करने पर । सतपुड़ा और विंध्याचल के मध्य हम हैं, हमारा मध्यप्रदेश है, वही मध्यप्रदेश जिसे प्रकृति हीरे की खदानें दी हैं । हरे भरे जंगल हैं । हजारों जड़ी - बूटियों की संजीवनी दी है । पुरावैभव का अद्भुत सौन्दर्य यहाँ साँची, खजुराहो, माण्डव, भीमबेटिका जैसी सम्पदा है तो नर्मदा की पावन घाटी भी । जहाँ महाकाल और ममलेश्वर (ओंकारेश्वर) जैसे दो ज्योतिर्लिंग के मध्य औद्योगिक, व्यावसायिक शहर इंदौर है तो भोपाल जैसी सौन्दर्ययुक्त राजधानी । क्या नहीं है हमारे पास मालवा की काली मिटटी भरा पठार है तो तपते हुए निमाड़ की गरमाहर भी है । हम समृद्व हैं, हम सम्पन्न हैं- आवश्यकता अपने प्रदेश की उर्वरकता,सम्पन्नता,समृद्वता को पहचानने की है- यह पहचान करने के लिए चाहिए दृष्टिकोण में परिवर्तन एक सकारात्मक सोच - मुख्यमंत्री आओ बनाएं अपना प्रदेश के आव्हान के साथ हमारी सोच हमारी विचाराधीन को सकारात्मक प्रवाह देने निकल रहे हंै । वे कहते हैं कि हमने विकास किया है लेकिन उन्नति और प्रगति की बहुत सी संभावनाएँ अभी खुली हुई हैं । प्रदेश को विकसित राज्यों की अग्रपांत में ले जाकर खड़ा करने के लिए उन्हें जनता का साथ चाहिए एक व्यापक सर्वानुमति तैयार किये जाने की जरूरत हैं । यहाँ राजनीतिक सौजन्य की एक लम्बी परम्परा हैं । प्रदेश के हित में सब दल एक हो जाने की परम्परा यह अभियान उसी परम्परा के निर्वाह से सफलता की दिशा में एक पहल है । आप जहाँ है सरकार वहाँ है- हम आपके पास है आप अपनी जगह से ही प्रदेश के प्रति अपने-अपने कर्तव्यों को पूरा करें । सरकार और समाज एक साथ खडे होंगे तो प्रदेश के नवनिर्माण के सपने स्वमेव ही साकार होने लगेंगे । चूंकि मध्यप्रदेश में आसपास के अनेक राज्यों के हिस्से आकर मिले जिसके कारण वहां की विविध संस्कृतियां यहां रहीं । इसके कारण मध्यप्रदेश की अपनी स्वयं की कोई एक सांस्कृतिक पहचान कायम नहीं हो पाई और लोगों में ' मध्यप्रदेशियत' का जज्बा नहीं बन पाया । राज्य की स्थापना के कुछ समय तक यह बात काफी हद तक सही भी रही लेकिन अब ऐसा नहीं है । आज प्रदेश के विभिन्न अंचलों में रहने वाले लोग स्वयं को मध्यप्रदेश का वासी होने पर गर्व का अनुभव करते हैं और उसे विकास के लिये पूरी निष्ठा से काम भी कर रहे हैं ।

वहाँ पलायन की कहानी पुरानी हो गई




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-स्वाति तिवारी
क्या आपने कोई ऐसी जगह देखी है जो आम और महुए से महकती हो ? पलाश के सूर्ख पुष्पों से दहकती हों और ढोल ढमाके और माँदल की थाप पर थिरकती हों ? एक विलक्षण सी दुनिया जो लोगों में हमेशा जिज्ञासा का विषय रही है, विश्व की एक आदिम सभ्यता जिसके अध्ययनों ने यह रोचक तथ्य उजागर किया हैं कि अपने जीवन्त संस्कारों,परम्पराओं और रीति-रिवाजों के कारण इस समाज की तुलना यूरोपीय समाज से की जा सकती हैं । सघन बस्ती बनाकर ये भी नहीं रहते और मदिरा का चलन यहाँ ताड़ी और महूएं के रूप में प्रचलित है । सभ्यता के तमाम संपर्क के बावजूद उनकी दुनियां में अभी बहुत कुछ अलग हैं जो चकित करता हैं । एक ऐसी सभ्यता जिसका उसकी धरती,पेड़,नदी से रिश्ता अब भी अपनी समग्रता में ही व्यक्त होता हैं । उनका अपना एक सौन्दर्य हैं,उनकी अपनी सम्पन्न समृद्ध परम्पराएं । जहाँ का भारी भरकम आम नूरजहाँ और शाहजहाँ कहलाता है ।
जी हाँ । मध्यप्रदेश की दक्षिणी -पश्चिमी सीमा पर फैले हुए झाबुआ और अलीराजपुर जिले विश्व की आदिम सभ्यता को आज तक अपने वनांचल में समेटे हुए- संरक्षित रखे हैं । दुनिया इन्हें आदिम कहे चाहे कुछ और पर सच यह हैं कि यहाँ की प्रकृति का अपना अलग वजूद है । इनकी अपनी एक सभ्यता है - अपनी एक सांस्कृतिक पहचान ।
यह वनांचल पौराणिक एवं एतिहासिक ही नहीं वरन पर्यावरण की दृष्टि से भी अपना महत्व रखता हैं । स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी चन्द्रशेखर आजाद के नाम के साथ यह क्षेत्र स्वर्णिम अक्षरों में उल्लेखित है । प्रकृति की गोद में जीवन यापन करने वाले यहाँ के वनवासी स्वभाव से स्वच्छन्द और स्वतंत्र होते हैं । यहां के प्रणय उत्सव भगोरिया की अपनी विशिष्ट पहचान हैं ।
दुनिया के तमाम छल,कपट से दूर यहां का आदिवासी बहुत ही भला और मासूम है लेकिन अभी हाल के वर्षों को छोड़ दे तो 1960 से लगातार सूखे की मार झेल रहे इन आदिवासियों को अपनी रोजी-रोटी का साधन जुटाने के लिये कुछ न कुछ तो करना होता था चाहे वह फिर अपराध ही क्यों न हो । यूँ तो आदिवासी की आवश्यकताएं सीमित होती हैं किन्तु आवश्यकताएँ आधुनिकता और सामाजिक जागरूकता के अनुपात में बढ़ती भी है फिर भूख एक ऐसी आवश्यकता को जन्म देती है कि व्यक्ति भला,बूरा सब भूल जाता है । अभी कुछ वर्षो पुरानी बात है कि रोजगार की तलाश में आदिवासियों को पलायन के लिए बाध्य होना पड़ता था । अपराध और पलायन दोनों की तह में जाने पर झाबुआ का जो सच सामने आता हैं उसमें ‘ खाद्य सुरक्षा’ ही रेखांकित होती है । सामान्यतः आदिवासी क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होते है किन्तु झाबुआ - अलीराजपुर की बिडम्वना है कि यहाँ यह सच नहीं हैं । यह क्षेत्र अतिशोषित और तेजी से खत्म हो रहे संसाधनों का जिला रहा
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हैं । सघन जंगलों से घिरा एक पहाड़ी क्षेत्र जहाँ वनवासी हैं पर वन नहीं है । वनस्पति अपघटन और मृदा क्षरण ने पहाड़ियों को नग्न कर दिया हैं । कुल कृषि क्षेत्र का 36 प्रतिशत ऐसा हैं जिस पर कोई मृदा आवरण नहीं हैं । एक सूखा ग्रस्त क्षेत्र जहाँ औसत वर्षा 786 मीली मीटर हैं । सतही जल स्त्रोत भी नहीं और भूमिगत जल भी अत्यन्त कम । कमजोर संसाधन और आदिवासियों का आर्थिक आधार भी कमजोर । ऐसे में गरीबी और भूख का विस्तार ऐसा कि ‘पलायन’ एक रास्ता बचता है जीवन बचाने का । अपराधों का भी यहीं विश्लेक्षण सामने आता रहा है । विगत पाँच वर्षो के शासन के विभिन्न प्रयासों, योजनाओं और रोजगार मूलक कार्यो ने इस आदिवासी अंचल की दशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । शिक्षा प्रसार व विकास के लिए किए गये कार्यो से यहाँ अपेक्षित परिणाम दिखाई देने लगे हैं । प्रदेश के झाबुआ जिले में इन दिनों रोजगार के लिये पलायन की समस्या नहीं है बल्कि जिले में पर्याप्त मात्रा में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं । आज से कुछ वर्षो पहले तक रोजगार के लिये पलायन इस क्षेत्र की एक विशिष्ट समस्या मानी जाती थी जो सूखे के वर्षो में संकट का रूप बन जाती थी ।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अपने दो दिवसीय भ्रमण में ‘आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश’ के आव्हान के साथ अपने वनवासी भाईयों से रूबरू होने जा रहे है । उनका पहला पड़ाव है अलीराजपुर क्षेत्र - यह क्षेत्र एक ऊबङ खाबड़ मैदान है जिसको हथनी और सुक्कड़ नदियों का अपवाह मिलता है । इस क्षेत्र में ताड़ी के कई पेड़ है जिसका रस आदिवासियों का प्रिय पेय है । फसल की दृष्टि से यहाँ कपास एक महत्वपूर्ण नगदी फसल हैं एवं मूंगफली अच्छी होती है । कृषि और पशुपालन की अच्छी संभावनाएं मौजूद हैं । अलीराजपुर के पास उद्यानिकी की भी बड़ी गुंजाइश है । एक वक्त ऐसा भी था जब यहाँ पलायन दर 33.6 प्रतिशत थी । अत्यधिक अपराध दर चिन्ता का मुख्य मुद्दा था । कुछ वर्षो पहले तक अलीराजपुर झाबुआ जिले की एक तहसील था, तब पूरे एशिया में सर्वाधिक हत्याएं इसी क्षेत्र में होती थी औसतन रोजाना एक । पर अब दृश्य बदल गया हैं । हत्याओं का दौर थमा है एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 1960 के बाद यह क्षेत्र सूखे की चपेट में आता रहा है और करीब एक लाख मजदूर काम की तलाश में पलायन करते थे, पर अब रोजगार की कमी नहीं होने दी जा रही है । जाहिर सी बात है कि जब हर हाथ को काम और भूखे को भोजन मिलेगा तो क्यों कर अपना वतन-अपनी जमीन छोड़ेगा । मुख्यमंत्री ग्राम टेमची,बेहड़वा,भाबरा,गेरूघाटी,जवानिया फाटा,तलावदा, उदयगढ़ होते हुए झाबुआ में प्रवेश करेंगे । झाबुआ में सबसे पहले वे रानापुर जायेंगे । रानापुर के आसपास का हिस्सा भी ऊसर हैं । एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार यहा 2200 हेक्टेयर भूमि पर बिगड़े वन हैं । मोद नदी जो उत्तरी दिशा में बहती है यहाँ का प्रमुख अपवाह तंत्र हैं । रानापुर में 13.8 प्रतिशत भूमि बंजर है जिस पर हरीतिमा नहीं है । उद्यानिकी की संभावनाओं को देखते हुए यहाँ ड्राई
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लैण्ड उद्यानिकी फसलों की संभावनाओं को विकल्प के रूप में देखा जा सकता है । मुख्यमंत्री रानापुर क्षेत्र में दूरस्थ आदिवासी अंचल में बनने ग्राम ढेकलबडी में रात्रि विश्राम करेंगे । इसे क्षेत्र के आदिवासियों का सौेभाग्य ही कहा जायगा कि प्रदेश का मुखिया उनके बीच - उनकी समस्याओं से रूबरू हो रहा है। वे यहाँ सामाजिक कार्यकर्ताओं,अशासकीय संस्थाओं और युवाओं से चर्चा करेंगे । मुख्यमंत्री अगले दिन झाबुआ के गोपालपुरा और मेघनगर होते हुए अगराल का दौरा करेंगे । यह क्षेत्र रोलिंग मैदान जैसा है जिसमें बीच बीच में पहाड़ियां हैं । यहाँ अनास नदी और उसके सहायक नगरीवाले अपवाह तंत्र हैं । कृषि भूमि प्रायः अच्छी है । मेघनगर जिले का सर्वश्रेष्ठ औद्योगिक स्थान हैं । यह पश्चिमी रेलवे पर स्थित है और रोजगार के तमाम अवसरों के लिए उपयुक्त ।
पेटलावद वाया थांदला का भ्रमण भी महत्वपूर्ण कहा जा सकता है । ये क्षेत्र अपेक्षाक़ृत विकसित कहे जा सकते हैं । थादंला के नगरीय क्षेत्र के समावेश से इस क्षेत्र का जनसंख्यात्मक चेहरा थोड़ा भिन्न है और गैर आदिवासी अनुपात साक्षरता व कृषि इतर कार्यो में श्रमशक्ति का नियोजन यहाँ ज्यादा है । तेन्दूपत्ता भी यहाँ के जंगल में मिलता है । चारा और घास भी अच्छी होती है । गहरी काली मिटटी और भूमिगत जलस्तर बेहतर रेल और सड़क संबद्धता भी बहुत अच्छी है । चारा अच्छा है तो डेयरी एवं पशुपालन के लिए यहाँ वेटनरी शिक्षा एवं योजनाएं युवावर्ग को रोजगार के लिए सम्बल बन सकती है ।
आदिवासी विरासत को बरकरार रखते हुए मुख्यमंत्री इन वनवासियों के लिएनई सोच के साथ कल्याणकारी योजनाएँ बनाने और उन पर सार्थक अमल करवाना चाहते है। यह मुख्यमंत्री की संजीदगी का ही परिणाम है कि आओ बनाएं अपना मध्यप्रदेश अभियान के तहत दो दिन तक आदिवासियों से रूबरू हो रहे हैं । वे यह देखना चाहते है कि आदिवासी सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ ले पा रहे है या नहीं ।
कुल मिलाकर अपनी इस दो दिवसीय यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री आदिवासियों को उनके दरवाजे पर दस्तक देकर योजनाओं के क्रियान्वयन की जानकारी लेंगे । वे उनसे यह भी पूंछेगे कि बताओ- उनके हिसाब से और क्या किया जा सकता है । उम्मीद की जानी चाहिये कि मुख्यमंत्री की यह यात्रा आदिवासियों की खुशहाली और समृद्धि के नये युग का सूत्रपात करेगी ।
पता- ईएन 1/9चार इमली
(लेखिका प्रदेश की जानी मानी साहित्यकार है)