जय मध्यप्रदेश
मध्य प्रदेश मध्य भारत का राज्य है, इसकी राजधानी भोपाल है । मध्य प्रदेश 1 नवंबर, २००० तक क्षेत्रफल के आधार पर भारत का सबसे बडा राज्य था। इस दिन छत्तीसगढ़ की स्थापना हुई थी। मध्य प्रदेश की सीमाऐं महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, छत्तीसभारत की संस्कृति में मध्यप्रदेश जगमगाते दीपक के समान है, जिसकी रोशनी की सर्वथा अलग प्रभा और प्रभाव है। विभिन्न संस्कृतियों की अनेकता में एकता का जैसे आकर्षक गुलदस्ता है, मध्यप्रदेश, जिसे प्रकृति ने राष्ट्र की वेदी पर जैसे अपने हाथों से सजाकर रख दिया है, जिसका सतरंगी सौन्दर्य और मनमोहक सुगन्ध चारों ओर फैल रहे हैं। यहाँ के जनपदों की आबोहवा में कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास तैरती रहती है। यहाँ के लोक समूहों और जनजाति समूहों में प्रतिदिन नृत्य, संगीत, गीत की रसधारा सहज रुप से फूटती रहती है। यहाँ का हर दिन पर्व की तरह आता है और जीवन में आनन्द रस घोलकर स्मृति के रुप में चला जाता है। इस प्रदेश के तुंग-उतुंग शैल शिखर विन्ध्य-सतपुड़ा, मैकल-कैमूर की उपत्यिकाओं के अन्तर से गूँजते अनेक पौराणिक आख्यान और नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान, तवा नदी, ताप्ती आदि सर-सरिताओं के उद्गम और मिलन की मिथकथाओं से फूटती सहस्त्र धाराएँ यहाँ के जीवन को आप्लावित ही नहीं करतीं, बल्कि परितृप्त भी करती हैं।
मध्यप्रदेश में पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है। ये पाँच साँस्कृतिक क्षेत्र है-1.निमाड़ .बघेलखण्ड
2.मालवा3.बुन्देलखण्ड5.ग्वालियर
प्रत्येक सांस्कृतिक क्षेत्र या भू-भाग का एक अलग जीवंत लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, कला, बोली और परिवेश है। मध्यप्रदेश लोक-संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान श्री वसन्त निरगुणे लिखते हैं- "संस्कृति किसी एक अकेले का दाय नहीं होती, उसमें पूरे समूह का सक्रीय सामूहिक दायित्व होता है। सांस्कृतिक अंचल (या क्षेत्र) की इयत्त्ता इसी भाव भूमि पर खड़ी होती है। जीवन शैली, कला, साहित्य और वाचिक परम्परा मिलकर किसी अंचल की सांस्कृतिक पहचान बनाती है।"
मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।
निष्कर्षत: मध्यप्रदेश पाँच सांस्कृतिक क्षेत्र निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड और ग्वालियर और धार-झाबुआ, मंडला-बालाघाट, छिन्दवाड़ा, होसंगाबाद, खण्डवा-बुरहानपुर, बैतूल, रीवा-सीधी, शहडोल आदि जनजातीय क्षेत्रों में विभक्त है।
मध्यप्रदेश में पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है। ये पाँच साँस्कृतिक क्षेत्र है-1.निमाड़ .बघेलखण्ड
2.मालवा3.बुन्देलखण्ड5.ग्वालियर
प्रत्येक सांस्कृतिक क्षेत्र या भू-भाग का एक अलग जीवंत लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, कला, बोली और परिवेश है। मध्यप्रदेश लोक-संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान श्री वसन्त निरगुणे लिखते हैं- "संस्कृति किसी एक अकेले का दाय नहीं होती, उसमें पूरे समूह का सक्रीय सामूहिक दायित्व होता है। सांस्कृतिक अंचल (या क्षेत्र) की इयत्त्ता इसी भाव भूमि पर खड़ी होती है। जीवन शैली, कला, साहित्य और वाचिक परम्परा मिलकर किसी अंचल की सांस्कृतिक पहचान बनाती है।"
मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।
निष्कर्षत: मध्यप्रदेश पाँच सांस्कृतिक क्षेत्र निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड और ग्वालियर और धार-झाबुआ, मंडला-बालाघाट, छिन्दवाड़ा, होसंगाबाद, खण्डवा-बुरहानपुर, बैतूल, रीवा-सीधी, शहडोल आदि जनजातीय क्षेत्रों में विभक्त है।
Sunday, September 4, 2011
Friday, September 2, 2011
पुत्रीवती भवः का आशीर्वाद दीजिए
क्या आप चाहते हैं कि आपका वंशज कुंवारा रह जाए? आपकी वंशबेल बगैर फले ही सुख जाए? आपकी देहरी पर दिया धरने वाला कोई ना हो? आपका नाम लेवा भी ना बचे? चौंकिए मत ऐसा ही कुछ भविष्य में होने वाला है अगर समय रहते नहीं सम्भले तो? 29 अक्टूबर 2007 को हैदराबाद में आयोजित एशिया-पेसिफिक कान्फ्रेंस में ऐसी ही कुछ भविष्य की चुनौतियाँ सामने आयी हैं। लिंग चयन के कारण भारत में सन 2050 तक 2 करोड़ 80 लाख पुरूषों की शादियाँ नहीं हो पाएंगी।
इन चुनौतियों और चेतावनी के लिए हमारी सामाजिक व्यवस्था का ‘‘पुत्र-प्रेम’’ जिम्मेदार माना जा सकता क्योंकि हर किसी को सन्तान के रूप में बेटे की चाहत है। हमारे बुजुर्ग अगर ‘‘पुत्रवती भवः’’ और दुधों नहाओ पुतों फलो का आशीर्वाद देते रहे तो। यह दिन दूर नहीं है। सोचने और समझने का वक्त आ गया है आज यदि हम अपने हित और स्वार्थ पर ऐसा कोई निण्रय लेते हैं तो वह आगे जाकर हमारे ही परिवार और समाज के लिए घातक और चिन्ताजनक मोड़ ला सकता है। आपकी तरह और लोग भी पुत्र मोह में फंसे हैं - तो जब सबके घर पुत्र ही जन्म लेने लगेंगे तो पुत्र-वधु कहाँ से लाएंगे? आज जिन बेटियों के जन्म के विषय में ‘दहेज’ की चिन्ता सता रही है कल को वह उल्टी पड़ सकती क्योंकि तब भी दहेज देना पड़ सकता है लड़का ब्याहने के लिए? क्या सोच रहे हैं अब? ये मजाक नहीं एक सच्चाई है। एक ऐसी सच्चाई जो सामने दिखायी दे रही है और समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक इस पर चिन्तन करने लगे हैं। चिन्तन करने से काम नहीं चलेगा जुटना होगा हम सबको ‘बेटी बचाओ’ के मिशन में। बचानी होगी हमें बेटियाँ। बेटियाँ भी सोन-चिरैया ना बन जाए वरना वे भी विलुप्ती के कगार पर पहुंच जायंगी और तब भविष्य कभी हमें माफ नहीं कर पायगा। कन्या भ्रुण हत्या के हमारे अनैतिक - अमानवीय निर्णयों के लिए। परिवार नियोजन की दुहाई देकर अगर आप लिंग चयन का मार्ग अपनाते हैं तो आप जनसंख्या वृद्धि रोकने का पुण्य नहीं कर रहे हैं। बल्कि आप जनसंख्या अनुपात बिगाड़ने का पाप कर रहे हैं। बचना होगा इस पाप महापाप के श्राप से। परिवार नियोजन जनसंख्या के लिए है, लिंग चयन के लिए नहीं। यह समझना होगा यह सिर्फ आपके परिवार का निजी मसला नहीं है। यह सामाजिक सरोकार का मामला है यह वैयक्ति नहीं सार्वभौमिक है। अतः आगे आएं कन्या पूजन, कन्या भोज से पहले कन्या जन्म पर खुशियाँ मनाएँ। केवल पुत्र रत्न नहीं कन्या रत्न पर भी बधाइयाँ पाएं।मत बनाइए और दिखाइए ‘मत आना इस देश लाड़ो’ बल्कि कहिए - राह देखता तेरी बेटी, जल्दी से तू आना किलकारी से घर भर देना, सदा ही तू मुस्काना। ना चाहूँ मैं धन और वैभव, बस चाहूँ मैं तुझको तू ही लक्ष्मी, तू ही शारदा, मिल जाएगी मुझको सारी दुनिया है एक गुलशन, तू इसको महकाय।
पर ऐसा कहने वालों की कमी है क्योंकि हमारा समाज स्त्री-निरपेक्ष ही नहीं, बल्कि स्त्री विरोधी है। सामाजिकरण की इस स्त्री विरोधी या कमतर या दोहम व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। यह बदलाव जरूरी है, घर-घर हाँ हर घर के लिए जरूरी है - क्योंकि इससे जुड़ी समस्याएं हमारे सामने हैं।
यह निर्विवाद है कि विश्व स्तर पर जनसंख्या की अधिकता एक समस्या बन गयी है पर उससे भी बड़ा चिन्ताजनक संकट स्त्री-पुरूष अनुपात में गिरावट का सामने दिखायी दे रहा है। यूनिसेफ की ‘राष्ट्रों की प्रगति’ नामक रिपोर्ट में उल्लेख है कि अतीत में 7 करोड़ भ्रुण सिर्फ इस कारण मार डाले गए क्योंकि वे कन्या के रूप में जन्म लेने का अपराध करने वाले थे। नोबल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन ने 1990 के जनसंखा अनुमान की अपेक्षा 10 करोड़ कम स्त्रियों के मौजूद रहने की बात कही, उनका कहना है कि भारत की 9 अरब आबादी के साथ 2.5 करोड़ स्त्री आबादी लापता हैं। इसी तरह यूनिसेफ ने 1995 ई. की ‘भारतीय राज्यों की प्रगति’ में अलर्ट करते हुए कहा था कि 4-5 करोड़ स्त्री आबादी विलुप्त होती जा रही हैं। झकझोर देने वाली यह नग्न सच्चाई 2011 की जनगणना में हमारी आँखे खोलने के लिए खतरनाक स्थिति में सामने आयी है। जिसके अनुसार भारत में शिशु लिंग अनुपात अब तक सबसे नीचे के स्तर पर पहुँचकर 914 हो गया है। 27 राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में शिशु लिंग अनुपात में गिरावट दर्ज की गई है तथा देश के 50 प्रतिशत जिलों में शिशु लिंग अनुपात में राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक गिरावट आई है। पिछले दशक में 10 राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में शिशु लिंग अनुपात में 22 से 82 बिन्दुओं की गिरावट दर्ज की गई है।
मध्यप्रदेश के शिशु लिंग अनुपात के 2001 से 2011 पर अगर गौर करते हैं तो हम गिरावट को समझ सकते हैं वर्ष 2001 में यह अनुपात 932 था जो वर्ष 2011 में 912 रह गया है। यू.एन.एफ.पी.ए. भारत 2010 रिपोर्ट भारत एवं राज्यों में लिंग चयन के कारण 2001 के मध्य अनुमानित ‘लापता बेटियाँ’ की गणना अनुसार लिंग चयन के कारण प्रतिवर्ष जन्म नहीं ले पाने वाली बेटियों की अनुमानित संख्या 6,01,468 अर्थात 4.8 प्रतिशत में से मध्यप्रदेश की स्थिति 17,261 अर्थात 1.9 प्रतिशत है। देश और प्रदेश की यह स्थिति एक चेतावनी है कि आने वाला समाज अपने वंश को आगे कैसे बढ़ा पायगा?
मध्यप्रदेश में भी लगातार लिंग अनुपात का गिरता ग्राफ देखकर सरकार भी निरन्तर चिंता जता रही है। सन 1991 में प्रदेश में 941, 2001 में 932 और वर्ष 2011 में 912 रह गया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान का कहना है कि स्त्री-पुरूष अनुपात में गिरावट अत्यन्त चिन्ताजनक है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या में कमी अनेक सामाजिक समस्याओं का कारण होती हैं, इसीलिए यह जरूरी है कि समय रहते इस सामाजिक सरोकार पर जनमानस को विकसित किया जाए। लाड़ली लक्ष्मी योजना से आगे एक कड़ी और समाज में जुड़नी चाहिए, लाड़ली लक्ष्मी तभी बनेगी जब वह जन्म लेगी। अतः बालिका बचाओ अभियान के द्वारा जनजागृति लानी होगी। ‘बेटी बचाओ अभियान’ का प्रारम्भ मुख्यमंत्री अपने शासकीय निवास पर नवदुर्गा उत्सव के दौरान कन्या पूजन से करने वाले हैं। इस जनजागृति के माध्यम से वे चाहते हैं कि लोगों को यह समझ आ जाए कि महत्त सन्तान की है बेटा-बेटी में भेद करना छोड़ दें। स्त्री को उसके स्वाभिमान के साथ समाज में जगह दी जानी चाहिए। हो सकता है आज जो पराई अमानत है, लेकिन क्या पता कल पूरी दुनिया के सामने आप फर्ख से कहें ये मेरी बेटी है।डा. स्वाति तिवारी(लेखिका जानी-मानी साहित्यकार है)
Tuesday, August 30, 2011
Wednesday, August 18, 2010
जनसंख्या स्थिरीकरण पर केन्द्रित
हमारा विकास और जनसंख्या नियंत्रण
डा. स्वाति तिवारी
सामाजिक सरोकारों में मेरे सूचनातंत्र का सबसे प्रबल खबरची मेरी कामवाली बाई, माली और चौकीदार हैं। कल फिर कमलाबाई ने मेरे चिन्तन को नई दिशा दी। हुआ कुछ यूँ कि कमलाबाई कल अपने साथ एक और बाई लेकर आयी यह कहते हुए कि आपके बंगले में सर्वेंट क्वाटर खाली है आप इसको दे दो। कमरे के बदले यह झाडूफटका कर देगी। मैंने पहला ही सवाल किया कि परिवार में कितने लोग हैं?
कमला ने ही जवाब दिया ‘‘पाँच बच्चे, पति पत्नी और सास बस।’’
‘‘बस मतलब? और होने में क्या?’’ कमला मेरे रूख को पहचान गई फट से उसने बात संभाली पाँचों बच्चे साथ नहीं रहते बड़े वाले दोनों बच्चे गाँव में इसकी माँ के साथ रहते हैं, आते जाते है कभी - कभी।
मैंने अपना गणित ठीक करते हुए गिना पाँच दो सात और एक आठ ?
कमरा दस बाय दस का? एक कमरा मात्र? नहीं मुझे कमरा नहीं देना। कमरा बहुत छोटा है तुम्हारे परिवार के लिए। फिर आठ आदमी मतलब आठ बाल्टी पानी नहाने का और आठ बाल्टी अन्य काम के लिए। फिर बिजली, फिर घर की आबोहवा? बाई चली गयी। पर प्रश्न और चिन्तन छोड़ गई मैंने अपने घर में जगह देने से इनकार कर दिया पर अबोली घरती और निशब्द आसमान अपनी जगह अपनी हवापानी के बंटवारे के लिए कैसे मना करें? और प्राकृतिक विपदा के शब्दों में करते भी हैं तो क्या आदमी समझ पा रहा है? समझ जाता तो क्या बढ़ती जनसंख्या के लिए हमें राष्ट्रीय चिन्तन करना पड़ता? मैं एक परिवार से बात कर चिन्तित हूँ। पूरे प्रदेश की जनसंख्या के आँकडे चौंकाने वाले हैं यह मुख्यमंत्री जी के लिए चिन्ता का विषय होना स्वाभाविक है।
भोपाल के लाल परेड मैदान पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश की बढ़ती आबादी पर चिन्ता प्रकट करते हुए कहा कि आमजन के जीवन स्तर में तेजी से सुधार तथा सभी को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के लिए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना आवश्यक है। केन्द्र ने भी लोकसभा में माना कि मौजूदा जनसंख्या नीति से आबादी के स्थिरीकरण के लिए 2070 तक इंतजार करना होगा इसलिए इस बारे में एक नयी नीति बनाने की जरूरत है। लोकसभा में जनसंख्या स्थिरीकरण विषय पर प्रस्ताव पेश करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलामनबी आज़ाद ने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान सहित मध्य भारत के कुछ राज्यों में प्रजनन दर लक्षित दर से दो गुनी है।
प्रदेश के समग्र विकास हेतु जनसंख्या स्थिरीकरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। राज्य में 43.5 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। कम उम्र में विवाह उच्च प्रजनन दर का एक मुख्य कारण होने के साथ-साथ उच्च शिशु मृत्युदर तथा उच्च मातृ मृत्युदर के लिए भी जिम्मेदार है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक राष्ट्रीय संस्था के अनुसार प्रदेश की कुल प्रजनन दर 3.1 है जो भारत की प्रजनन दर 2.6 की तुलना में काफी अधिक है। विगत वर्षों में लिए गये प्रयासों के बावजूद प्रजनन दर में वांछित कमी नहीं आना ही चिन्ता का विषय है।
इन सभी चिन्ताओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान वर्ष 2010-11 को परिवार कल्याण वर्ष घोषित किया है। आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारा प्रदेश जनसंख्या-वृद्धि से ही नहीं बल्कि जनसंख्या - विस्फोट से ग्रस्त है। जिसके कारण हमारा जीवन स्तर, हमारा आर्थिक विकास, हमारे भावनात्मक एवं सामाजिक संबंध सब कुछ विकटताओं से भरा है।
हम जी तोड़ कोशिश करके अपनी विकास की दर को आगे बढ़ाते हैं उतनी ही तेजी से जनसंख्या की वृद्धि-दर हमारे विकास-वृद्धि के आंकड़े को पीछे कर देती है। जनसंख्या विस्फोट एक सापेक्ष शब्द है, देश में उत्पादित खाद्यान्नों और संसाधनों की अपेक्षा यदि जनसंख्या अधिक है वो वह अति जनसंख्या कहलाती है। अतिजनसंख्या खाद्यान्नों एवं संसाधनों की तुलना में दोगुनी हो जाती है तो वह जनसंख्या विस्फोट कहलाते लगती है। इस विस्फोटक स्थिति से बचने के लिए आवश्यकता है जनसंख्या स्थिरीकरण पर पूरजोर प्रयासों की। जिसके हमें शिशु मृत्युदर, मातृ मृत्युदर और कुल प्रजनन दर में कमी लाने के साथ ही कुछ अन्य व्यावहारिक सूत्रों को भी पकड़ना होगा। केवल वर्ष मनाने या नीति भर बनाने से इस समस्या से छूटकारा मिलना सम्भव नहीं है। जनसंख्या नीति की सफलता में भी प्राथमिक शर्त है सफल जनभागीदारी।
हमारे प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण को परिवार कल्याण कार्यक्रम में रखा गया है। जिसमें परिवार नियोजन और प्रजनन व बाल स्वास्थ्य गतिविधियां शामिल हैं, जो जनसंख्या को नियंत्रित व स्थिर करने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। राज्य में जनसंख्या वृद्धि की गति का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1951 से 1980 के बीच 30 वर्षों में आबादी दो गुनी यानि 2 करोड़ 60 लाख से बढ़कर 1981 से 5 करोड़ 20 लाख लोग 2015 तक दस करोड़ 40 लाख हो जायेंगे।
यदि भारत सरकार के योजना आयोग द्वारा गठित जनसंख्या प्रक्षेपणों पर तकनीकी दल के निष्कर्ष पर गौर करें तो उनके वर्ष 2060 के बाद मध्यप्रदेश प्रतिस्थापन प्रजनन दर 2.1 के स्तर तक पहुंच पाएगा जो जनसंख्या को स्थिर करने की प्रक्रिया की मूलभूत आवश्यकता है। यदि ऐसा हुआ तो वर्ष 2061 की जनगणना में प्रदेश की जनसंख्या 19 करोड़ हो जायगी। इतने विशाल जनसंख्या आधार का लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में सहज ही अनुमान लगाने पर यह मात्र मुख्यमंत्री या सरकार के चिन्तन का विषय नहीं है यह आम नागरिक की चिन्ता का विषय भी है। यह हमारे विकास को बुरी तरह प्रभावित भी कर रहा है।
राज्य की कुल जनसंख्या में 39 प्रतिशत लोग 15 वर्ष से कम आयु के है तथा स्त्रियों की संख्या 48 प्रतिशत है। इस आयु संरचना के कारण जनसंख्या वृद्धि की अपार सम्भावनाओं को देखते हुए भारत शासन द्वारा गठित जनसंख्या स्थिरता कोष, योजना का उद्देश्य प्रदेश में आर्थिक विकास, सामाजिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप स्तर पर सन 2045 तक जनसंख्या स्थिर करना है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा वर्ष 2010-11 को परिवार कल्याण वर्ष घोषित करने का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या स्थिरीकरण एवं प्रदेश के चौमुखी विकास को गति देना है।
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पर केन्द्रित
हमारा विकास और जनसंख्या नियंत्रण
डा. स्वाति तिवारी
सामाजिक सरोकारों में मेरे सूचनातंत्र का सबसे प्रबल खबरची मेरी कामवाली बाई, माली और चौकीदार हैं। कल फिर कमलाबाई ने मेरे चिन्तन को नई दिशा दी। हुआ कुछ यूँ कि कमलाबाई कल अपने साथ एक और बाई लेकर आयी यह कहते हुए कि आपके बंगले में सर्वेंट क्वाटर खाली है आप इसको दे दो। कमरे के बदले यह झाडूफटका कर देगी। मैंने पहला ही सवाल किया कि परिवार में कितने लोग हैं?
कमला ने ही जवाब दिया ‘‘पाँच बच्चे, पति पत्नी और सास बस।’’
‘‘बस मतलब? और होने में क्या?’’ कमला मेरे रूख को पहचान गई फट से उसने बात संभाली पाँचों बच्चे साथ नहीं रहते बड़े वाले दोनों बच्चे गाँव में इसकी माँ के साथ रहते हैं, आते जाते है कभी - कभी।
मैंने अपना गणित ठीक करते हुए गिना पाँच दो सात और एक आठ ?
कमरा दस बाय दस का? एक कमरा मात्र? नहीं मुझे कमरा नहीं देना। कमरा बहुत छोटा है तुम्हारे परिवार के लिए। फिर आठ आदमी मतलब आठ बाल्टी पानी नहाने का और आठ बाल्टी अन्य काम के लिए। फिर बिजली, फिर घर की आबोहवा? बाई चली गयी। पर प्रश्न और चिन्तन छोड़ गई मैंने अपने घर में जगह देने से इनकार कर दिया पर अबोली घरती और निशब्द आसमान अपनी जगह अपनी हवापानी के बंटवारे के लिए कैसे मना करें? और प्राकृतिक विपदा के शब्दों में करते भी हैं तो क्या आदमी समझ पा रहा है? समझ जाता तो क्या बढ़ती जनसंख्या के लिए हमें राष्ट्रीय चिन्तन करना पड़ता? मैं एक परिवार से बात कर चिन्तित हूँ। पूरे प्रदेश की जनसंख्या के आँकडे चौंकाने वाले हैं यह मुख्यमंत्री जी के लिए चिन्ता का विषय होना स्वाभाविक है।
भोपाल के लाल परेड मैदान पर स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने उद्बोधन में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश की बढ़ती आबादी पर चिन्ता प्रकट करते हुए कहा कि आमजन के जीवन स्तर में तेजी से सुधार तथा सभी को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के लिए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना आवश्यक है। केन्द्र ने भी लोकसभा में माना कि मौजूदा जनसंख्या नीति से आबादी के स्थिरीकरण के लिए 2070 तक इंतजार करना होगा इसलिए इस बारे में एक नयी नीति बनाने की जरूरत है। लोकसभा में जनसंख्या स्थिरीकरण विषय पर प्रस्ताव पेश करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री गुलामनबी आज़ाद ने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान सहित मध्य भारत के कुछ राज्यों में प्रजनन दर लक्षित दर से दो गुनी है।
प्रदेश के समग्र विकास हेतु जनसंख्या स्थिरीकरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। राज्य में 43.5 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। कम उम्र में विवाह उच्च प्रजनन दर का एक मुख्य कारण होने के साथ-साथ उच्च शिशु मृत्युदर तथा उच्च मातृ मृत्युदर के लिए भी जिम्मेदार है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक राष्ट्रीय संस्था के अनुसार प्रदेश की कुल प्रजनन दर 3.1 है जो भारत की प्रजनन दर 2.6 की तुलना में काफी अधिक है। विगत वर्षों में लिए गये प्रयासों के बावजूद प्रजनन दर में वांछित कमी नहीं आना ही चिन्ता का विषय है।
इन सभी चिन्ताओं के मद्देनजर मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान वर्ष 2010-11 को परिवार कल्याण वर्ष घोषित किया है। आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारा प्रदेश जनसंख्या-वृद्धि से ही नहीं बल्कि जनसंख्या - विस्फोट से ग्रस्त है। जिसके कारण हमारा जीवन स्तर, हमारा आर्थिक विकास, हमारे भावनात्मक एवं सामाजिक संबंध सब कुछ विकटताओं से भरा है।
हम जी तोड़ कोशिश करके अपनी विकास की दर को आगे बढ़ाते हैं उतनी ही तेजी से जनसंख्या की वृद्धि-दर हमारे विकास-वृद्धि के आंकड़े को पीछे कर देती है। जनसंख्या विस्फोट एक सापेक्ष शब्द है, देश में उत्पादित खाद्यान्नों और संसाधनों की अपेक्षा यदि जनसंख्या अधिक है वो वह अति जनसंख्या कहलाती है। अतिजनसंख्या खाद्यान्नों एवं संसाधनों की तुलना में दोगुनी हो जाती है तो वह जनसंख्या विस्फोट कहलाते लगती है। इस विस्फोटक स्थिति से बचने के लिए आवश्यकता है जनसंख्या स्थिरीकरण पर पूरजोर प्रयासों की। जिसके हमें शिशु मृत्युदर, मातृ मृत्युदर और कुल प्रजनन दर में कमी लाने के साथ ही कुछ अन्य व्यावहारिक सूत्रों को भी पकड़ना होगा। केवल वर्ष मनाने या नीति भर बनाने से इस समस्या से छूटकारा मिलना सम्भव नहीं है। जनसंख्या नीति की सफलता में भी प्राथमिक शर्त है सफल जनभागीदारी।
हमारे प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण को परिवार कल्याण कार्यक्रम में रखा गया है। जिसमें परिवार नियोजन और प्रजनन व बाल स्वास्थ्य गतिविधियां शामिल हैं, जो जनसंख्या को नियंत्रित व स्थिर करने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। राज्य में जनसंख्या वृद्धि की गति का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1951 से 1980 के बीच 30 वर्षों में आबादी दो गुनी यानि 2 करोड़ 60 लाख से बढ़कर 1981 से 5 करोड़ 20 लाख लोग 2015 तक दस करोड़ 40 लाख हो जायेंगे।
यदि भारत सरकार के योजना आयोग द्वारा गठित जनसंख्या प्रक्षेपणों पर तकनीकी दल के निष्कर्ष पर गौर करें तो उनके वर्ष 2060 के बाद मध्यप्रदेश प्रतिस्थापन प्रजनन दर 2.1 के स्तर तक पहुंच पाएगा जो जनसंख्या को स्थिर करने की प्रक्रिया की मूलभूत आवश्यकता है। यदि ऐसा हुआ तो वर्ष 2061 की जनगणना में प्रदेश की जनसंख्या 19 करोड़ हो जायगी। इतने विशाल जनसंख्या आधार का लोगों के जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में सहज ही अनुमान लगाने पर यह मात्र मुख्यमंत्री या सरकार के चिन्तन का विषय नहीं है यह आम नागरिक की चिन्ता का विषय भी है। यह हमारे विकास को बुरी तरह प्रभावित भी कर रहा है।
राज्य की कुल जनसंख्या में 39 प्रतिशत लोग 15 वर्ष से कम आयु के है तथा स्त्रियों की संख्या 48 प्रतिशत है। इस आयु संरचना के कारण जनसंख्या वृद्धि की अपार सम्भावनाओं को देखते हुए भारत शासन द्वारा गठित जनसंख्या स्थिरता कोष, योजना का उद्देश्य प्रदेश में आर्थिक विकास, सामाजिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप स्तर पर सन 2045 तक जनसंख्या स्थिर करना है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा वर्ष 2010-11 को परिवार कल्याण वर्ष घोषित करने का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या स्थिरीकरण एवं प्रदेश के चौमुखी विकास को गति देना है।
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पर केन्द्रित
Thursday, April 8, 2010
Thursday, February 18, 2010
अस्तित्व से व्यक्तित्व गढ़ रहा शिल्पी
-स्वाति तिवारी
मध्यप्रदेश में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक सामाजिक और सरकारी क्रान्ति का सूत्रपात हुआ हैं । महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य है कि महिला अपने अस्तित्व की स्थापना करके अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके अर्थात महिला की पहचान होना पहली शर्त है । किन्तु जब अस्तित्व ही नहीं होता तो व्यक्तित्व के विकास की बात निरर्थक लगती है । भारत की अनेक महिलाओं का जीवन स्तर मानवीय श्रेणी के मापदंडों से काफी निम्न रहा है । फारवर्ड वुमन ऑफ इंडिया में फ्रान्स के एक प्रसिद्ध लेखक ने लिखा था कि किसी भी देश की स्थिति को देखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है, उस देश की स्त्रियों की स्थिति का पता लगाना ।
मध्यप्रदेश सरकार ने अपने प्रदेश के विकास के लिये इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं । स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में कौशिशे अब तक कईयों ने की लेकिन वह सब नारों, झंडों और बेनरों में उलझ कर रह गए जबकि जरूरत थी ठोस जमीनी प्रयासों की । मध्यप्रदेश में महत्वाकांक्षी लाड़ली लक्ष्मी, कन्यादान,जननी सुरक्षा और समानता एंव बराबरी का हक अर्थात महिलाओं को स्थानीय निकाय चुनावों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर शिवराज सरकार ने यह जता दिया है कि वे पहले महिलाओं का अस्तित्व बनाने के लिए कटिबद्ध हैं । देश के इतिहास में पहली बार महिलाओं को इतने व्यापक रूप में सत्ता में भागीदारी मिली है । एक तरफ देश में लम्बे समय से महिला आरक्षण की बात और बहस चल रही है, लेकिन कोई उस पर एकमत नहीं हो पा रहे हैं, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने पूरी ईमानदारी के साथ स्थानीय संस्थाओं में उन्हें बराबरी का भागीदार बनाकर महिला शक्ति के प्रति अपनी भावनाएं और निष्ठा का परिचय दे दिया । यह एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ आम तौर पर पुरूष किसी सूरत में महिला को हम सफर बनाना पसंद नहीं कर रहा था । वह उसे चौके-चूल्हे तक सीमित देखना चाहता था, लेकिन हवा का रूख बदला और मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों और पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर भाजपा सरकार ने अपने इरादे जाहिर कर दिए ।
त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं को वित्तीय और प्रशासनिक ॰ष्टि से सशक्त बनाने और इसके माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण के परिणामों पर नजर डाले तो चौकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं । मध्यप्रदेश में एक शान्त क्रान्ति के रूप में गांवों और शहरों के विकास के लिए सत्ता की बागडोर दो लाख से ज्यादा महिलाओं के हाथ में हो गयी है । संविधान निर्माताओं के सपनों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि कुछ इस तरह से दिखाई देती है -एक लाख 80 हजार महिला पंच, 11
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हजार 320 महिला सरपंच, 3400 महिला जनपद सदस्य, 415 महिला जिला पंचायत सदस्य, 156 जनपदों और 25 जिला पंचायतों में महिला अध्यक्ष, 1780 महिला पार्षद, 95 नगर पंचायत महिला अध्यक्ष, 32 नगर पालिका महिला अध्यक्ष,8 नगर निगमों में महिला महापौर, यह तो हुआ तस्वीर का एक पहलू,अब दूसरे पर भी नजर दौड़ाए- शिवराज सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना को देश भर में सराहा गया। इस अद्भुत योजना के तहत आंगनवाड़ी योजना में पंजी.त,परिवार नियोजन अपना चुके और दो बच्चों तक वाली दंपति यदि आयकर नहीं भरती है और उनकी एक संतान लड़की है या दूसरी संतान जुड़वा लड़की भी है तो दोनों के नाम 30 हजार रूपए के राष्ट्रीय बचत पत्र खरीद कर उन्हें दे दिए जाएंगे। जिनके ब्याज से वे छठी,नवमी,ग्यारवीं और बारहवीं में क्रमशः 2 हजार, 4 हजार, साढे सात हजार तथा दो वर्ष तक 200 रूपए माह रकम मिलेगी । साथ बालिग होने पर शादी के बाद करीब एक लाख रूपए से ज्यादा मिलेगा । गरीब, कमजोर वर्ग के लिए यह योजना किसी वरदान से कम नहीं । जहां एक तरफ इस कन्या की शिक्षा की व्यवस्था हो जाएगी, वहीं दूसरी तरफ उसके व्याह का भी इंतजाम हो जाएगा । इस योजना के तहत प्रदेश में वर्ष 2010 के आखिर तक करीब 2 लाख लाड़लियां लाभान्वित हो जाएंगी । सोचिए ये कन्याएं और उनके अभिभावक सरकार को कितनी दुआएं देंगे ।
इसी तरह मुख्यमंत्री कन्या योजना के तहत करीब 75 हजार गरीब कन्याओं का विवाह कराया जा चुका है । शिवराज सरकार का यह एक ऐसा अनुपम प्रयास है जिसमें भी उसे ढेर सारी दुआएं मिलती हैं । हालांकि शिवराज सरकार यह सिर्फ यश और दुआओं के लिए नहीं कर रही बल्कि वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी खूब समझती है । वह जानती है कि इस प्रदेश में गरीबों की बहुलता है, जहाँ दो वक्त की रोटी का प्रबंध करना ही टेढ़ी खीर होता है वहाँ शादी-व्याह जैसे संस्कारों के लिए भला कहाँ से अतिरिक्त धन आ सकता है ? ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी गरीब कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा था, लेकिन यह किसने देखा कि तब वह कितने कर्ज में डूबकर और हाथ खींचकर बेटी को बिदा करता था जबकि अब वह खुशी-खुशी इसे अंजाम देता है ।
ठीक इसी तरह जननी सुरक्षा योजना के तहत शिवराज सरकार ने प्रदेश भर की 17 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसूति के लिए मदद उपलब्ध कराई । पहले अनेक प्रसूताएं अस्पताल पहुंचने से पहले ही या इलाज के अभाव में घर पर ही दम तोड़ देती थी । इस सिलसिले पर अब काफी हद तक विराम लगा है ।
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इससे शिशु मृत्यु दर पर तो रोक लगी ही, साथ ही प्रसूताओं की मृत्यु दर पर भी रोक लगी है ।
ये वे चुनिन्दा काम है, जो आम तौर पर प्रचारित हो जाते हैं या फिर लाभान्वित लोग ही इसकी चर्चा कर देते हैं लेकिन परदे के पीछे भी यह सरकार ऐसे अनगिनत कामों को अंजाम दे रही है, जो जन कल्याण से जुडे हैं किन्तु उनका जिक्र कम ही होता है । पिछले चार वर्षो में मध्यप्रदेश ने बेहद भिन्न तरीके से विकास की रफ्तार तय की है । ऐसा महसूस होने लगा है कि प्रदेश में कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो उल्लेखनीय है । यह साफ दिख रहा है कि जनता की नव्ज पहचान ली गई है और उसके मुताबिक ही उपचार किया जा रहा है । यही वहज है कि यह प्रदेश स्वस्थ, खुशहाल और विकासोन्मुख होता रहा है ।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल
संपर्क 9424011334,९४२५०५६५०५
राज एक्सप्रेस भोपाल में प्रकाशित दिनांक १९/०२/10
मध्यप्रदेश में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक सामाजिक और सरकारी क्रान्ति का सूत्रपात हुआ हैं । महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य है कि महिला अपने अस्तित्व की स्थापना करके अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके अर्थात महिला की पहचान होना पहली शर्त है । किन्तु जब अस्तित्व ही नहीं होता तो व्यक्तित्व के विकास की बात निरर्थक लगती है । भारत की अनेक महिलाओं का जीवन स्तर मानवीय श्रेणी के मापदंडों से काफी निम्न रहा है । फारवर्ड वुमन ऑफ इंडिया में फ्रान्स के एक प्रसिद्ध लेखक ने लिखा था कि किसी भी देश की स्थिति को देखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है, उस देश की स्त्रियों की स्थिति का पता लगाना ।
मध्यप्रदेश सरकार ने अपने प्रदेश के विकास के लिये इसी दिशा में कदम बढ़ाए हैं । स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में कौशिशे अब तक कईयों ने की लेकिन वह सब नारों, झंडों और बेनरों में उलझ कर रह गए जबकि जरूरत थी ठोस जमीनी प्रयासों की । मध्यप्रदेश में महत्वाकांक्षी लाड़ली लक्ष्मी, कन्यादान,जननी सुरक्षा और समानता एंव बराबरी का हक अर्थात महिलाओं को स्थानीय निकाय चुनावों में 50 प्रतिशत आरक्षण देकर शिवराज सरकार ने यह जता दिया है कि वे पहले महिलाओं का अस्तित्व बनाने के लिए कटिबद्ध हैं । देश के इतिहास में पहली बार महिलाओं को इतने व्यापक रूप में सत्ता में भागीदारी मिली है । एक तरफ देश में लम्बे समय से महिला आरक्षण की बात और बहस चल रही है, लेकिन कोई उस पर एकमत नहीं हो पा रहे हैं, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने पूरी ईमानदारी के साथ स्थानीय संस्थाओं में उन्हें बराबरी का भागीदार बनाकर महिला शक्ति के प्रति अपनी भावनाएं और निष्ठा का परिचय दे दिया । यह एक ऐसा क्षेत्र था जहाँ आम तौर पर पुरूष किसी सूरत में महिला को हम सफर बनाना पसंद नहीं कर रहा था । वह उसे चौके-चूल्हे तक सीमित देखना चाहता था, लेकिन हवा का रूख बदला और मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों और पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर भाजपा सरकार ने अपने इरादे जाहिर कर दिए ।
त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं को वित्तीय और प्रशासनिक ॰ष्टि से सशक्त बनाने और इसके माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण के परिणामों पर नजर डाले तो चौकाने वाले आंकड़े सामने आते हैं । मध्यप्रदेश में एक शान्त क्रान्ति के रूप में गांवों और शहरों के विकास के लिए सत्ता की बागडोर दो लाख से ज्यादा महिलाओं के हाथ में हो गयी है । संविधान निर्माताओं के सपनों को पूरा करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि कुछ इस तरह से दिखाई देती है -एक लाख 80 हजार महिला पंच, 11
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हजार 320 महिला सरपंच, 3400 महिला जनपद सदस्य, 415 महिला जिला पंचायत सदस्य, 156 जनपदों और 25 जिला पंचायतों में महिला अध्यक्ष, 1780 महिला पार्षद, 95 नगर पंचायत महिला अध्यक्ष, 32 नगर पालिका महिला अध्यक्ष,8 नगर निगमों में महिला महापौर, यह तो हुआ तस्वीर का एक पहलू,अब दूसरे पर भी नजर दौड़ाए- शिवराज सरकार द्वारा शुरू की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना को देश भर में सराहा गया। इस अद्भुत योजना के तहत आंगनवाड़ी योजना में पंजी.त,परिवार नियोजन अपना चुके और दो बच्चों तक वाली दंपति यदि आयकर नहीं भरती है और उनकी एक संतान लड़की है या दूसरी संतान जुड़वा लड़की भी है तो दोनों के नाम 30 हजार रूपए के राष्ट्रीय बचत पत्र खरीद कर उन्हें दे दिए जाएंगे। जिनके ब्याज से वे छठी,नवमी,ग्यारवीं और बारहवीं में क्रमशः 2 हजार, 4 हजार, साढे सात हजार तथा दो वर्ष तक 200 रूपए माह रकम मिलेगी । साथ बालिग होने पर शादी के बाद करीब एक लाख रूपए से ज्यादा मिलेगा । गरीब, कमजोर वर्ग के लिए यह योजना किसी वरदान से कम नहीं । जहां एक तरफ इस कन्या की शिक्षा की व्यवस्था हो जाएगी, वहीं दूसरी तरफ उसके व्याह का भी इंतजाम हो जाएगा । इस योजना के तहत प्रदेश में वर्ष 2010 के आखिर तक करीब 2 लाख लाड़लियां लाभान्वित हो जाएंगी । सोचिए ये कन्याएं और उनके अभिभावक सरकार को कितनी दुआएं देंगे ।
इसी तरह मुख्यमंत्री कन्या योजना के तहत करीब 75 हजार गरीब कन्याओं का विवाह कराया जा चुका है । शिवराज सरकार का यह एक ऐसा अनुपम प्रयास है जिसमें भी उसे ढेर सारी दुआएं मिलती हैं । हालांकि शिवराज सरकार यह सिर्फ यश और दुआओं के लिए नहीं कर रही बल्कि वह अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भी खूब समझती है । वह जानती है कि इस प्रदेश में गरीबों की बहुलता है, जहाँ दो वक्त की रोटी का प्रबंध करना ही टेढ़ी खीर होता है वहाँ शादी-व्याह जैसे संस्कारों के लिए भला कहाँ से अतिरिक्त धन आ सकता है ? ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी गरीब कन्या का विवाह नहीं हो पा रहा था, लेकिन यह किसने देखा कि तब वह कितने कर्ज में डूबकर और हाथ खींचकर बेटी को बिदा करता था जबकि अब वह खुशी-खुशी इसे अंजाम देता है ।
ठीक इसी तरह जननी सुरक्षा योजना के तहत शिवराज सरकार ने प्रदेश भर की 17 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं को प्रसूति के लिए मदद उपलब्ध कराई । पहले अनेक प्रसूताएं अस्पताल पहुंचने से पहले ही या इलाज के अभाव में घर पर ही दम तोड़ देती थी । इस सिलसिले पर अब काफी हद तक विराम लगा है ।
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इससे शिशु मृत्यु दर पर तो रोक लगी ही, साथ ही प्रसूताओं की मृत्यु दर पर भी रोक लगी है ।
ये वे चुनिन्दा काम है, जो आम तौर पर प्रचारित हो जाते हैं या फिर लाभान्वित लोग ही इसकी चर्चा कर देते हैं लेकिन परदे के पीछे भी यह सरकार ऐसे अनगिनत कामों को अंजाम दे रही है, जो जन कल्याण से जुडे हैं किन्तु उनका जिक्र कम ही होता है । पिछले चार वर्षो में मध्यप्रदेश ने बेहद भिन्न तरीके से विकास की रफ्तार तय की है । ऐसा महसूस होने लगा है कि प्रदेश में कहीं कुछ ऐसा हो रहा है जो उल्लेखनीय है । यह साफ दिख रहा है कि जनता की नव्ज पहचान ली गई है और उसके मुताबिक ही उपचार किया जा रहा है । यही वहज है कि यह प्रदेश स्वस्थ, खुशहाल और विकासोन्मुख होता रहा है ।
स्वाति तिवारी
ईएन-1/9 चार इमली भोपाल
संपर्क 9424011334,९४२५०५६५०५
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